बंदरों के बढ़ते आतंक पर हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगी ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना

Allahabad High Court: हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बंदरों के बढ़ते आतंक और मानव-बंदर संघर्ष की घटनाओं पर राज्य सरकार से ठोस, प्रभावी और समयबद्ध कार्ययोजना मांगी है। अगली सुनवाई 1 सितंबर 2026 तय की है।
Allahabad High Court Seeks Comprehensive Action Plan to Tackle Monkey Menace in Uttar Pradesh
इलाहाबाद हाईकोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Allahabad High Court Statement: उत्तर प्रदेश में बंदरों के बढ़ते आतंक और मानव-बंदर संघर्ष की घटनाओं को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस समस्या के समाधान के लिए प्रभावी, व्यापक और दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कागजी कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि समयबद्ध और ठोस रणनीति बनाकर उसे धरातल पर लागू करना आवश्यक है।

अगली सुनवाई एक सितंबर 2026 को निर्धारित

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि प्रदेश के कई जिलों में बंदरों का आतंक लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। कोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के नेतृत्व में गठित 13 सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति से विस्तृत और व्यावहारिक योजना प्रस्तुत करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई एक सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

प्रदेश के कई जिलों में बंदरों की संख्या तेजी से बढ़ रही

यह जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ता विनीत शर्मा और बीटेक छात्र प्रजाक्ता सिंघल द्वारा दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि प्रयागराज, कौशांबी, सीतापुर, बरेली, आगरा समेत प्रदेश के कई जिलों में बंदरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। कई क्षेत्रों में 200 से अधिक बंदरों के झुंड घूमते हैं, जिससे बच्चों, किसानों और आम नागरिकों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है। बंदरों के हमलों से लोगों को चोटें भी लग रही हैं और फसलों को नुकसान पहुंच रहा है।

पर्यावरण विभाग को सौंपी गई बंदर प्रबंधन की नोडल जिम्मेदारी

सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण बंदरों के प्राकृतिक आवास और भोजन के स्रोत कम हुए हैं, जिससे मानव-बंदर संघर्ष बढ़ा है। अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने अदालत को बताया कि बंदर प्रबंधन की नोडल जिम्मेदारी पर्यावरण विभाग को सौंपी गई है। रीसस मकाक (लाल मुंह वाले बंदर) की संख्या और प्रभावित क्षेत्रों का विस्तृत फील्ड सर्वे कराया जाएगा, जिसमें लगभग एक वर्ष का समय लग सकता है।

हाईकोर्ट ने बंदरों को पकड़ने, उनके सुरक्षित परिवहन और उपयुक्त स्थानों पर छोड़े जाने की प्रक्रिया को भी तेज करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के प्रस्तावित एनिमल शेल्टर पर विचार करने और नगर विकास विभाग को भी इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने को कहा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जनता की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए स्थायी समाधान तैयार किया जाना चाहिए।

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