

स्टाफ की कमी के कारण कई विभागों में कामकाज बाधित
एक डॉक्टर के जिम्मे सैकड़ों मरीजों के इलाज की जिम्मेदारी
इलाज और जांच में परेशानी के चलते अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल
Meerut Doctors-Paramedical Staff Shortage: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख सरकारी चिकित्सा केंद्रों में शुमार मेरठ का प्यारेलाल शर्मा जिला अस्पताल इस समय खुद गंभीर रूप से बीमार चल रहा है। अस्पताल में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी किल्लत के कारण चिकित्सा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। आलम यह है कि अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को सामान्य ओपीडी परामर्श से लेकर गंभीर पैथोलॉजिकल और रेडियोलॉजिकल जांचों के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई विभागों में ताले लटके हैं तो कई जगह एक ही डॉक्टर के भरोसे सैकड़ों मरीजों की ओपीडी चल रही है, जिससे स्थिति हर गुजरते दिन के साथ बदतर होती जा रही है।
बता दें कि पंजीकरण खिड़की से ही शुरू होती है परेशानी मरीजों और तीमारदारों को परेशान करती हुई दिखाई देती है। सुबह होते ही अस्पताल परिसर में पर्चा बनवाने के लिए मरीजों की लंबी कतारें लग जाती हैं। बुजुर्ग, महिलाएं और गंभीर रूप से बीमार मरीज ओपीडी के बाहर डॉक्टरों के इंतजार में जमीन पर बैठने को मजबूर हैं। अस्पताल का कार्डियोलॉजी विभाग विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के चलते महीनों से लगभग बंद पड़ा है। जिसके चलते ओपीडी में सामान्य मौसमी बीमारियों के इलाज के लिए भी मरीजों को वरिष्ठ डॉक्टरों का परामर्श नहीं मिल पा रहा है।
शिशुओं के इलाज के लिए पर्याप्त पीडियाट्रिशियन न होने से तीमारदार बच्चों को लेकर इधर उधर भटक रहे हैं। रूटीन सर्जरी के लिए मरीजों को महीनों लंबी तारीखें दी जा रही हैं या उन्हें हायर सेंटर रेफर किया जा रहा है। अस्पताल में सबसे बदतर स्थिति एक्स-रे, सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड जैसी महत्वपूर्ण जांचों की है। गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को अल्ट्रासाउंड के लिए दो से तीन महीने बाद का समय दिया जा रहा है। पैथोलॉजी लैब में स्टाफ का इतना टोटा है कि, खून, यूरिन और अन्य जरूरी बायोकेमिस्ट्री जांचों के लिए लैब के बाहर मरीजों की भारी भीड़ उमड़ रही है।
अस्पताल परिसर में जांचें न होने का फायदा उठाकर निजी लैब के दलाल सक्रिय हो गए हैं जो मरीजों को बाहर ले जा रहे है। मुफ्त इलाज की उम्मीद में आने वाले गरीब ग्रामीणों को मजबूरी में हजारों रुपए खर्च कर बाहर से जांच करानी पड़ रही है। डॉक्टरों की कमी के साथ-साथ अस्पताल के दवा काउंटर पर भी कई आवश्यक जीवन रक्षक दवाएं नदारद हैं। अक्सर इमरजेंसी वार्ड में अफरा-तफरी की खबर भी सामने आई है। रात के समय आने वाले इमरजेंसी मामलों को संभालने के लिए पर्याप्त कैजुअल्टी मेडिकल ऑफिसर उपलब्ध नहीं हैं।
एक्सीडेंट के गंभीर मामलों में प्राथमिक उपचार के बाद सीधे मरीजों को दिल्ली या लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों और वार्ड बॉय की कमी के कारण वार्डों में साफ-सफाई का स्तर बेहद दयनीय हो चुका है। लंबी लाइनों और समय पर इलाज न मिलने के कारण आए दिन तीमारदारों और स्वास्थ्य कर्मियों के बीच तीखी नोकझोंक हो रही है। स्वास्थ्य विभाग के बेहतर चिकित्सा सुविधाएं देने और डिजिटल रिपोर्टिंग के सारे दावे धरातल पर पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं।
अस्पताल प्रशासन के सूत्रों के अनुसार, डॉक्टरों के स्वीकृत पदों के मुकाबले लगभग आधे से अधिक पद रिक्त चल रहे हैं। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक द्वारा शासन को डॉक्टरों की तैनाती के लिए कई बार रिमाइंडर भेजे जा चुके हैं, लेकिन नतीजा शून्य रहा है। मेरठ के स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों द्वारा अस्पताल की इस दुर्दशा पर कोई ठोस कदम न उठाए जाने से जनता में भारी आक्रोश है।