

एमएलसी चुनाव के संकेतों ने जातीय समीकरणों पर बढ़ाई चिंता
गैर-यादव ओबीसी के बड़े वोट बैंक पर BJP और सपा की नजर
PDA (पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक) की काट खोज रही भाजपा
UP BJP Purvanchal Caste Equation: दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है और यूपी की राजनीति में पूर्वांचल की भूमिका हमेशा अहम रही है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पूर्वांचल में बदलते जातीय समीकरण BJP के लिए चिंता का विषय बनते दिख रहे हैं। पार्टी के आंतरिक सर्वे, आम लोगों के बीच हो रही चर्चाओं और हाल के एमएलसी चुनाव के नतीजों से जुड़े रुझानों ने उसकी चुनौतियां बढ़ा दी हैं।
पिछले चुनावों के अनुभव भी भाजपा के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं। एक तरफ विपक्ष पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट करने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर आपसी खींचतान भी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में भाजपा के सामने पूर्वांचल में अपना पुराना सामाजिक समीकरण मजबूत करने और नाराज नेताओं को साथ रखने की चुनौती है।
पूर्वांचल की राजनीति में गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इनमें कुर्मी समुदाय को एक बड़ा मतदाता वर्ग माना जाता है। कुर्मी आबादी मध्य यूपी से लेकर पूर्वांचल तक फैली हुई है। ऐसे में इस समुदाय का समर्थन चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।
हाल ही में हुए एमएलसी चुनाव में लखनऊ की शिक्षक और स्नातक सीटों पर भाजपा और समाजवादी पार्टी, दोनों के उम्मीदवार कुर्मी समुदाय से थे। इनमें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार विजयी रहे। इस नतीजे ने भी जातीय समीकरणों को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज कर दी है।
2014 से 2019 के बीच भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समुदायों को साथ लेकर मजबूत सामाजिक गठबंधन तैयार किया था। कुर्मी, मौर्य, राजभर, निषाद और अन्य पिछड़े वर्गों के साथ गैर-जाटव दलित मतदाताओं का समर्थन पार्टी की चुनावी मजबूती का अहम आधार बना।
हालांकि, बाद के चुनावों में इस सामाजिक गठबंधन में दरारें दिखाई देने लगीं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के PDA यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वाले राजनीतिक नैरेटिव ने भाजपा के इस समीकरण को चुनौती दी।
अब स्थिति यह है कि जातीय नेताओं का अपनी-अपनी बिरादरी के पूरे वोट बैंक पर पहले जैसा प्रभाव नहीं माना जा रहा। मतदाताओं की पसंद में बदलाव और विपक्ष की रणनीति ने चुनावी मुकाबले को और जटिल बना दिया है।
भाजपा ने पूर्वांचल में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में इस क्षेत्र के कई नेताओं को जगह दी है। इसके बावजूद हाल के एमएलसी चुनावों के नतीजों को लेकर पार्टी की चिंता बढ़ने की चर्चा है।
चुनाव के रुझानों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को मजबूती मिली, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के नतीजे पार्टी के लिए निराशाजनक बताए जा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, भाजपा के आंतरिक सर्वे में भी पूर्वांचल को लेकर चिंता सामने आई है।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह क्षेत्र इसी व्यापक राजनीतिक क्षेत्र में आते हैं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी भी पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं।
पूर्वांचल भाजपा के साथ-साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सहयोगी दलों के लिए भी महत्वपूर्ण है। ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), संजय निषाद की निषाद पार्टी और आशीष पटेल के अपना दल (एस) का राजनीतिक आधार भी इस क्षेत्र में है।
योगी मंत्रिमंडल में पूर्वांचल से जुड़े कई प्रमुख नेता शामिल हैं। इनमें प्रयागराज से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी, वाराणसी से दयाशंकर दयालु, अनिल राजभर, रवींद्र जायसवाल और हंसराज विश्वकर्मा शामिल हैं।
इसके अलावा बलिया से दयाशंकर सिंह और दानिश आजाद अंसारी, देवरिया से सूर्य प्रताप शाही और मऊ से दारा सिंह चौहान जैसे नेता भी सरकार में प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में पूर्वांचल में चुनावी प्रदर्शन का असर भाजपा के साथ उसके सहयोगी दलों की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, 2027 में उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए भाजपा को कई मौजूदा विधायकों के टिकट बदलने पड़ सकते हैं। हालांकि, ऐसा करने पर टिकट कटने की आशंका से पार्टी में असंतोष और नेताओं के दूसरी ओर जाने की चुनौती भी सामने आ सकती है।
भाजपा को एक तरफ अपने नेताओं के बीच आपसी खींचतान संभालनी होगी, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सत्ता विरोधी मुद्दों का भी जवाब देना होगा। फिलहाल पार्टी की ओर से इस दिशा में किसी बड़े कदम की स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है।
पूर्वांचल में जातीय समीकरणों को साधने के लिए भाजपा स्थानीय गैर-यादव ओबीसी और दलित नेताओं को संगठन में प्राथमिकता देने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के नेटवर्क के जरिए अलग-अलग सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
पार्टी पन्ना प्रमुखों और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को अति-पिछड़े और दलित समुदायों की बस्तियों से सीधे जोड़ने के लिए भी अभियान चला रही है। इसका उद्देश्य जातीय सीमाओं से आगे बढ़कर विभिन्न वर्गों के मतदाताओं तक पहुंच बनाना है।
इसके अलावा, पार्टी ने हाल ही में घोषित बड़े संगठनात्मक प्रकोष्ठों और निगमों आदि में जगह नहीं पा सके नेताओं को अन्य जिम्मेदारियां देकर असंतोष कम करने की कोशिश की है।
पूर्वांचल में भाजपा के सामने चुनौती केवल जातीय समीकरणों को साधने की नहीं, बल्कि संगठन के भीतर एकजुटता बनाए रखने की भी है। पार्टी को गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं के बीच अपना समर्थन मजबूत करना होगा। वहीं, समाजवादी पार्टी के PDA नैरेटिव और विपक्ष की रणनीति का मुकाबला भी करना होगा।
ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पूर्वांचल भाजपा के लिए अहम राजनीतिक परीक्षा बन सकता है। पार्टी की रणनीति, सहयोगी दलों के साथ तालमेल और स्थानीय नेताओं की भूमिका यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि वह अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को कितना मजबूत कर पाती है।