

ध्रुव त्रिपाठी की लगातार चौथी जीत
निर्दलीय राजीव यादव ने दी कड़ी टक्कर
तीसरे स्थान पर रहे सपा प्रत्याशी डॉ. संजयन त्रिपाठी
नतीजों ने PDA के सियासी समीकरण पर खड़े किए सवाल
Gorakhpur BJP vs SP: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला आखिर है क्या? पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक या फिर पिछड़ा, दलित और अगड़ा? क्या इसमें पंडितों के लिए भी जगह है? गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के नतीजों के बाद ये सवाल एक बार फिर सियासी गलियारों में चर्चा का विषय हैं। भाजपा प्रत्याशी ध्रुव कुमार त्रिपाठी लगातार चौथी बार विधान परिषद पहुंचे, जबकि निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव ने उन्हें कड़ी टक्कर दी। दूसरी तरफ, PDA के बैनर तले चुनाव लड़ने वाले सपा प्रत्याशी डॉ. संजयन त्रिपाठी तीसरे स्थान पर रहे।
योगी आदित्यनाथ के गढ़ में भाजपा की इस जीत को पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिहाज से अहम मान रही है। वहीं, सपा के लिए यह चुनाव अपने सामाजिक समीकरण और PDA की रणनीति पर विचार करने का अवसर बन गया है।
इस चुनाव में सपा की रणनीति की चर्चा उम्मीदवार चयन के साथ ही शुरू हो गई थी। भाजपा से बगावत कर सपा में आए डॉ. संजयन त्रिपाठी को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया, जबकि पहले घोषित उम्मीदवार कमलेश यादव का टिकट काट दिया गया। माना जा रहा था कि ब्राह्मण चेहरे को आगे करके सपा अपने सामाजिक आधार का विस्तार करने की कोशिश कर सकती है। लेकिन चुनाव परिणामों ने इस रणनीति की सफलता पर सवाल खड़े कर दिए।
अखिलेश यादव अलग-अलग मंचों से PDA की व्यापक व्याख्या करते रहे हैं। कभी इसे पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों से जोड़कर देखा जाता है, तो कभी अगड़ों और अन्य वंचित समूहों को भी इसमें शामिल करने की बात सामने आती है। ऐसे में सवाल है कि क्या PDA का यह बदलता राजनीतिक संदेश पार्टी के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं तक स्पष्ट रूप से पहुंच पा रहा है?
मतगणना के दौरान भाजपा के डॉ. ध्रुव कुमार त्रिपाठी और निर्दलीय राजीव यादव के बीच कांटे का मुकाबला देखने को मिला। दोनों के बीच मुकाबला अंतिम चरण तक चर्चा में रहा। वहीं, सपा प्रत्याशी डॉ. संजयन त्रिपाठी मुकाबले में पिछड़ते हुए तीसरे स्थान पर पहुंच गए।
इस बीच मतगणना स्थल पर एक घटनाक्रम ने राजनीतिक चर्चा को और तेज कर दिया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और अखिलेश यादव के करीबी माने जाने वाले रजनीश यादव शुरुआत में डॉ. संजयन त्रिपाठी के खेमे में बैठे थे। लेकिन राजीव यादव के बढ़त बनाने के बाद वह उनके कैंप में जाकर बैठ गए। इस घटनाक्रम को लेकर सवाल उठे कि आखिर सपा के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच उम्मीदवार को लेकर कैसी स्थिति थी?
हालांकि, किसी नेता के कैंप में बैठने भर से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सपा का पूरा कोर वोटर निर्दलीय प्रत्याशी की तरफ चला गया। इसके लिए मतदान के आंकड़ों और स्थानीय समीकरणों का विश्लेषण जरूरी है।
डॉ. संजयन त्रिपाठी का तीसरे स्थान पर रहना सपा के लिए आत्ममंथन का विषय जरूर है। क्या पार्टी अपने उम्मीदवार के पक्ष में अपेक्षित एकजुटता कायम नहीं कर पाई? क्या टिकट बदलने के फैसले से स्थानीय स्तर पर असंतोष था? या निर्दलीय राजीव यादव अपने व्यक्तिगत संपर्क और स्वीकार्यता के दम पर मुकाबले में आगे निकल गए?
इन तमाम सवालों के जवाब समाजवादी पार्टी को तलाशना जरूरी है। शिक्षक MLC चुनाव में उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, शिक्षकों के बीच संपर्क और स्थानीय समीकरण भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए हार को केवल जातीय समीकरण से जोड़ना उचित नहीं होगा।
फिलहाल सवाल यही है कि अखिलेश यादव PDA का दायरा बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन क्या उनका संदेश कार्यकर्ताओं और मतदाताओं तक उसी रूप में पहुंच पा रहा है? गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक MLC चुनाव ने सपा के सामने यही चुनौती रखी है। भाजपा के लिए यह जीत उत्साह बढ़ाने वाली है, जबकि सपा के लिए उम्मीदवार चयन, संगठनात्मक एकजुटता और PDA की रणनीति की समीक्षा करने का अवसर है।