

Australia Social Media Rules: वैसे तो अभी तक यही होता आ रहा था कि सोशल मीडिया पर आपकी स्क्रीन पर क्या दिखाई देगा यह सिर्फ आपकी पसंद पर निर्भर नहीं करता। इसमें Instagram, Facebook, TikTok जैसे प्लेटफॉर्म यूजर्स की गतिविधियों को समझने वाले रिकमेंडेशन एल्गोरिदम के जरिए अगली पोस्ट और वीडियो तय करते हैं। आपने किसी वीडियो को कितनी देर देखा, क्या लाइक किया या किस तरह के कंटेंट पर ज्यादा रुके इन संकेतों के आधार पर आपकी फीड लगातार बदलती रहती है।
लेकिन अब ऑस्ट्रेलिया इस व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। बता दें कि सरकार का फोकस सोशल मीडिया कंपनियों के उस सिस्टम पर लगाम लगाने पर है जो यूजर्स की ऑनलाइन गतिविधियों के आधार पर लगातार नया कंटेंट चुनकर सामने लाता है। ऐसे में खास चिंता बच्चों और कम उम्र के यूजर्स को लेकर है जो कई बार एक ही तरह के कंटेंट में लंबे समय तक फंसे रह जाते हैं।
आज के समय में ज्यादातर सोशल मीडिया ऐप्स पर फीड अपने आप तैयार होती है। जिसमें यूजर ने पहले क्या देखा, किस पोस्ट पर क्लिक किया और किस वीडियो को पूरा या बार-बार देखा इन सभी संकेतों का इस्तेमाल प्लेटफॉर्म अगला कंटेंट सुझाने के लिए करते हैं। अगर ऐसे पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन सिस्टम पर रोक या सख्त नियम लागू होते हैं तो फीड दिखाने का तरीका बदल सकता है। जिसमें प्लेटफॉर्म आपकी हर गतिविधि के आधार पर लगातार अगला वीडियो चुनने के बजाय किसी दूसरे सिस्टम का इस्तेमाल कर सकते हैं।
लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं होगा कि सोशल मीडिया बंद हो जाएगा। यूजर्स दोस्तों की पोस्ट देख पाएंगे, वीडियो चला सकेंगे और प्लेटफॉर्म का सामान्य इस्तेमाल कर सकेंगे। बस बदलाव मुख्य रूप से कंटेंट रिकमेंडेशन के तरीके में होने वाला है।
बताया जा रहा है कि नियम लागू होने पर Big Tech कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर भी असर पड़ सकता है। जिसमें Meta और TikTok जैसी कंपनियां यूजर्स को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने के लिए पर्सनलाइज्ड कंटेंट रिकमेंडेशन पर काफी निर्भर करती हैं। ऐसे में अगर ऑस्ट्रेलिया इस सिस्टम को सीमित करता है तो कंपनियों को अपने फीड और रिकमेंडेशन मॉडल में बदलाव करना पड़ सकता है। साथ ही दूसरे देशों में भी इसी तरह के नियमों की चर्चा तेज होने की संभावना बन सकती है
देखा जा रहा है कि इस नियम के आने से सबसे बड़ा संभावित फायदा यह हो सकता है कि यूजर्स को लगातार उनकी पसंद का कंटेंट दिखाने वाला सिस्टम कमजोर हो जाएगा। इससे सोशल मीडिया पर बिताया जाने वाला समय कम करने में मदद मिल सकती है और बच्चों के लिए भी ऑनलाइन अनुभव कुछ हद तक बदल सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है जो एल्गोरिदम की मदद से मिलने वाला पर्सनलाइज्ड कंटेंट कम होने पर यूजर्स को अपनी पसंद की चीजें खुद खोजनी के काम में लगा सकता हैं। जिसक सीधा मतलब है कि सोशल मीडिया का अनुभव ज्यादा कंट्रोल्ड लेकिन कम पर्सनलाइज्ड हो सकता है। वहीं आने वाले समय में ऑस्ट्रेलिया का यह कदम सोशल मीडिया कंपनियों और यूजर्स के बीच प्राइवेसी, डिजिटल वेलबीइंग और कंटेंट कंट्रोल की बहस को और बड़ा कर सकता है।