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‘मसि कागद छूयौ नहीं, कलम नहीं गही हाथ’ कागज-कलम से उनकी कोई पहचान नहीं

  • Written By: अमन दुबे
Updated On: Oct 07, 2022 | 03:05 PM
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लखनऊ : कबीर (Kabir) कपड़ा बुनते थे, कुछ लोग जाल बुनते थे, कबीर का चरखा सही मायनों में आज के समय का स्वदेशी (Swadeshi) का सबसे सफल प्रतीक है। एक मॉडल है, जिसे गांधी (Gandhi) ने स्वीकार लिया था, जिसे स्वदेशी का नाम देकर आजादी (Azadi) की लड़ाई लड़ी थी। तब भी इसे खत्म करने की साजिश हुई थी, आज भी हो रही है। मगर, उनसे कोई कबीर खत्म नहीं होता, किसी कबीर का धंधा चैपट नहीं होता, बशर्ते कि वह कबीर ही हो या कम से कम कबीर जैसा हो, सोच से, कर्म से।

गांधी का आजादी आंदोलन अंग्रेजों का विरोध करने से ज्यादा स्वराज पर टिका था, स्वदेशी की अवधारणा पर टिका था। अंग्रेजों का विरोध तो बहुत सारे क्रांतिकारी अपने-अपने तरीकों से कर ही रहे थे, मगर गांधी को ज्यादा शक्ति स्वराज और स्वदेशी अवधारणा के कारण मिली और इसकी प्रेरणा कबीर ही हैं। इसी के कारण भारत का जन-जन आंदोलन से जुड़ पाया था, विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई थी, विदेशियों की कंपनियों का बहिष्कार हुआ था। गांधी स्वयं विदेश में पढ़े-लिखे थे, उन्हें विदेशी लोगों या वस्तुओं से निरा बैर नहीं था, बल्कि वे स्वदेशी की अवधारणा को आमजन की अवधारणा बनाना चाहते थे, ताकि भारत के गांव आत्मनिर्भर बन सकें, स्वावलंबी बन सकें। इसकी प्रेरणा कबीर ही थे, जिन्होंने अपने कर्मयोग से चरखा-करघा को ही नहीं, पूरी जुलाहा जाति को समाज में सम्मान दिलाया था। सभी लोग अपने घर-गांव में बुना कपड़ा ही पहनते थे। इससे न सिर्फ जुलाहा जाति को रोजगार मिलता था, बल्कि बड़ी संख्या में किसान कपास की खेती कर आजीविका पाते थे। खेती-किसानी भी फल-फूल रही थी तो पशुपालन का व्यवसाय भी उसी से पोषित हो रहा था। गांव-गांव दूध की नदियाँ बह रही थीं। बिना किसी किताबी ज्ञान, बिना किसी उच्च शिक्षा के गांव का हर आदमी प्रकृति के इस व्यावहारिक ज्ञान को समझ जाता था, वैसा ही करने लगता था।

देखकर जिया है और सफलतापूर्वक जिया है

कबीर ने भी वैसे ही सब कुछ सीख लिया। वे कहते भी हैं, ‘लिखालिखी की है नहीं, देखादेखी बात’। जो चखा है, वहीं कहा है, वहीं किया है। वहाँ पांडित्य का कोई अर्थ नहीं है। कबीर खुद भी पंडित नहीं हैं। कहा है कबीर ने ‘मसि कागद छूयौ नहीं, कलम नहीं गही हाथ’ कागज-कलम से उनकी कोई पहचान नहीं है। सब कुछ मौखिक है, सब कुछ देखकर सीखा है, देखकर जिया है और सफलतापूर्वक जिया है। कबीर ही क्यों, हर कोई वैसे ही जीता-करता रहा है। यही परंपरा थी, यही संस्कृति थी।

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कोई व्यवसाय अकेला नहीं था, सबको साथ जोड़कर किए जाने वाला व्यवसाय ही चलता था। वहीं सबका साथ, सबका विकास था। किसान खेती करता तो पशुपालन भी करता। पशुपालन ज्यादा होने से गोबर की खाद पर्याप्त होती थी, जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति का क्षय नहीं होता था। बाहर से कोई और उवर्रक डालने की आवश्यकता ही नहीं थी, इसलिए उर्वरकों की न कंपनी खुली थीं, न दुकानें सजी थीं। सब कुछ प्राकृतिक चक्र के साथ स्वतः ही सहज भाव से चल रहा था, न प्रकृति का दोहन होता था, न मानव का शोषण। गांव का हर व्यक्ति गांव में ही रोजगार पा जाता था। 

उन्होंने साजिश के तहत इस मॉडल को तोड़ने, खत्म करने की कोशिश की

वहीं स्वदेशी का सबसे सफल मॉडल था, उदाहरण था। जिसमें कबीर ने आहुति देकर पहचान दिलाई थी। राजा-महाराजाओं का कर भी व्यापार से ज्यादा किसान से ही आता था। हालांकि इसमें शोषण और अत्याचार भी हुआ, सबसे ज्यादा अंग्रेजों के समय हुआ। उन्होंने साजिश के तहत इस मॉडल को तोड़ने, खत्म करने की कोशिश की, चूंकि गुलामी काल था, इसलिए कोई विरोध नहीं कर पाया और धीरे-धीरे समाज की यह स्वदेशी व्यवस्था खत्म होती गई और इसकी जगह कारपोरेट संस्कृति फैलती गई जो पूरी तरह से पश्चिम और यूरोप से आयातित थी। गांधी ने सबसे पहले इसी पीड़ा को समझा और उन्होंने स्वदेशी को ही अपना नारा बनाया क्योंकि अंग्रेजों की गुलामी बर्दाश्त की जा सकती थी, लेकिन गांव की अर्थव्यवस्था ही खत्म हो जाए, लोग ही बेरोजगार हो जाएँ फिर तो कुछ बचता ही नहीं। यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था, क्योंकि आम जनमानस भी बड़ी आसानी से यह बात समझ गया और गांधी के साथ उठ खड़ हुआ। 

खादी केवल नेताओं की वेशभूषा का प्रतीक बनकर रह गई

यह स्वदेशी की ही ताकत थी, मगर आजादी के बाद का जो सपना गांधी ने देखा, बाद में राजनेता ही उसे भूल गए। जिस स्वदेशी अवधारणा के कारण इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ था, उसे ही बिसरा दिया। खादी केवल नेताओं की वेशभूषा का प्रतीक बनकर रह गई, जिसका खामियाजा आज तक पूरा समाज भुगत रहा है। हालांकि कुछ भारतीय राजनेता फिर भी गाहे-बगाहे इसकी बात करते रहे हैं, मगर ठोस प्रयास न होने, ठोस कदम न उठाने से गांवों के कुटीर-उद्योग पनप नहीं पाए, या यूँ कहना ज्यादा उचित है कि वे कम होते गए, खत्म होते गए।

वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फिर से इसे जोरदार तरीके से उठाया गया है। स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया के अंतर्गत कुटीर उद्योगों, गांव-देहात में फैले उद्यमों को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जा रही है।

– मृगेंद्रराम त्रिपाठी, यूपी

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Published On: Oct 07, 2022 | 03:05 PM

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