

Badminton Scoring System: बैडमिंटन में स्कोरिंग सिस्टम को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चाओं के बीच आखिरकार बड़ा फैसला सामने आ गया है। 25 अप्रैल को बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (बीडब्ल्यूएफ) ने आधिकारिक तौर पर नए स्कोरिंग सिस्टम को लागू करने की घोषणा कर दी। अब तक खेले जा रहे 3×21 प्वाइंट्स फॉर्मेट की जगह 3×15 प्वाइंट सिस्टम को अपनाया जाएगा। इस बदलाव के साथ खेल के प्रारूप में बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा, जिसका असर खिलाड़ियों की रणनीति और खेलने के तरीके पर भी पड़ेगा।
डेनमार्क के हॉर्सन्स में आयोजित बीडब्ल्यूएफ की वार्षिक आम बैठक में इस प्रस्ताव को पेश किया गया, जिसे दो-तिहाई बहुमत से मंजूरी मिल गई। नए नियम के अनुसार अब मैच 21 अंकों की बजाय 15 अंकों के तीन गेम्स में खेले जाएंगे। यह बदलाव बैडमिंटन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि पिछले करीब दो दशकों से 3×21 का फॉर्मेट ही इस्तेमाल किया जा रहा था। बीडब्ल्यूएफ की अध्यक्ष खुनिंग पटामा लीस्वदत्राकुल ने इस फैसले को खेल के भविष्य के लिए जरूरी बताया। उन्होंने कहा, "यह बदलाव बैडमिंटन को और अधिक तेज, आकर्षक और दर्शकों के लिए रोमांचक बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है।"
नए स्कोरिंग सिस्टम को अगले साल की शुरुआत में लागू किया जाएगा। बीडब्ल्यूएफ के मुताबिक, यह नियम 4 जनवरी से प्रभावी हो जाएगा। इसके साथ ही मौजूदा 3×21 फॉर्मेट का अंत हो जाएगा और सभी अंतरराष्ट्रीय मुकाबले नए नियमों के तहत खेले जाएंगे। इस बदलाव के बाद खिलाड़ियों को अपनी रणनीति और खेल शैली में बदलाव करना होगा, क्योंकि छोटे गेम्स में हर पॉइंट की अहमियत और बढ़ जाएगी।
हालांकि इस फैसले को लेकर सभी खिलाड़ी खुश नहीं हैं। भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु और साइना नेहवाल ने इस बदलाव पर अपनी नाखुशी जाहिर की है। साइना ने कहा, "सुधार के नाम पर कहीं खेल अपनी असली पहचान न खो दे।" वहीं दो बार की ओलंपिक पदक विजेता पीवी सिंधु ने भी इस फैसले को लेकर चिंता जताई है।
पूर्व मुख्य कोच विमल कुमार ने भी इस बदलाव की आलोचना की है। उन्होंने कहा, "मैं बीडब्ल्यूएफ के इस फैसले से बेहद निराश हूं। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि कार्यकारी परिषद के सदस्यों ने इसका समर्थन किया। यह दुखद है कि एक ऐसा खेल, जिसे खासकर एशिया में बेहद पसंद किया जाता है, उसे ऐसे कारणों से बदला जा रहा है जो इसकी असली चुनौतियों को हल नहीं करते।" इस फैसले ने बैडमिंटन जगत में नई बहस छेड़ दी है, जहां एक तरफ इसे आधुनिक बदलाव माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कई दिग्गज इसे खेल की मूल भावना के खिलाफ बता रहे हैं।