

SIR Voter List Removal: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के माध्यम से देश के 13 करोड़ नागरिकों के नाम हटा दिए गए। दिल्ली में 48 लाख और महाराष्ट्र में 2 करोड़ नाम हटाए गए। क्या ऐसा कदम संविधान और कानून के लिहाज से उचित माना जा सकता है? हमारे संविधान निर्माताओं ने वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतंत्र दिया था।
संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार ऐसा हर व्यक्ति जो भारत का नागरिक है और जिसकी आयु 21 वर्ष (अब 18) है, मतदाता के रूप में खुद को पंजीबद्ध कराने का हकदार है बशर्ते वह पागल या अपराधी न हो। जब अधिकांश नागरिकों के पास आधार कार्ड, वोटर कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, पासपोर्ट, जन्म प्रमाणपत्र या एसएससी पास करने का प्रमाणपत्र है तो करोड़ों लोगों का मताधिकार क्यों छीना गया ? चुनाव आयोग यह तो नहीं कह सकता कि यह विदेशी हैं।
संविधान के अनुच्छेद 14 में समानता के अधिकार की गारंटी दी गई है, लेकिन मनमाने तौर पर मतदाता सूची से उनके नाम हटाए गए। जनप्रतिनिधित्व गए। जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 मतदाता की योग्यता के बारे में है। इसके खंड 3 में मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) तैयार करने के बारे में कहा गया है। ऐसा व्यक्ति जो भारत का नागरिक नहीं है अथवा विक्षिप्त है अथवा भ्रष्ट कार्यकलाप करता हो उसे मतदाता के रूप में पंजीबद्ध नहीं किया जा सकता।
सेक्शन 22 में मतदाता सूची में सुधार के बारे में बताया गया है। यदि कोई व्यक्ति जीवित न हो या अन्य चुनाव क्षेत्र में रहने चला गया हो तो उसका नाम मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। यदि ऐसा है तो एकदम 13 करोड़ लोगों के नाम क्यों वोटर लिस्ट से हटाए गए? वह कब, कैसे और कहां अपना मतदान का अधिकार वापस हासिल कर सकते हैं? बीएलओ ने नाम हटा दिए और चुनाव आयोग ने सूची जारी कर दी।
अपनी नागरिकता सिद्ध करने की जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल दी गई। यदि उनका नाम मतदाता सूची में नहीं रहेगा तो वह पासपोर्ट कैसे बनवा पाएंगे? मुफ्त अनाज तथा अन्य सरकारी सुविधाएं उन्हें कैसे मिल पाएंगी? बिहार और बंगाल में बड़ी संख्या में मतदाता सूची से नाम हटाए गए। इन लाखों-करोड़ों लोगों का भविष्य क्या होगा? इस बात में शक नहीं कि चुनाव स्वतंत्र व निष्पक्ष होने चाहिए।
डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि मताधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है। किसी स्थानीय सरकार के पूर्वाग्रह या किसी अधिकारी की सनक के चलते किसी का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भी कहा था कि यदि लोकतंत्र चाहिए तो भारत की सार्वभौम जनता को निस्संदिग्ध रूप से अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करने की आजादी होनी चाहिए। चुनाव आयोग का काम स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव कराना है। उसे किसी की नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा