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नवभारत विशेष: उत्तराखंड पर ग्लेशियर फूटने का खतरा

Uttarakhand Glacier:वैज्ञानिकों ने सावधान किया है कि बढ़ती गर्मी से अचानक विनाशकारी हिमनद विस्फोट हो सकता है। ऐसा विस्फोट मिनटों में लाखों क्यूबिक पानी छोड़ देगा।

  • By दीपिका पाल
Updated On: Nov 29, 2025 | 12:14 PM

उत्तराखंड पर ग्लेशियर फूटने का खतरा (सौ. डिजाइन फोटो)

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नवभारत डिजिटल डेस्क: 2013 की केदारनाथ बाढ़, जिसमें 5,000 से अधिक व्यक्तियों की जान गई थी व करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति नष्ट हो गई थी, वैज्ञानिकों के अनुसार बादल फटने व जीएलओएफ के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी। ग्लोबल वार्मिंग और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों ने हिमालय को जीएलओएफ के लिए सबसे खतरनाक क्षेत्रों में शामिल कर दिया है; क्योंकि यहां तेजी से फैल रहीं ग्लेशियल झीलें उत्तराखंड के डाउनस्ट्रीम समुदायों, इन्फ्रास्ट्रक्चर व हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट्स के लिए मुख्य खतरा बन गईं हैं। वैज्ञानिकों ने सावधान किया है कि बढ़ती गर्मी से अचानक विनाशकारी हिमनद विस्फोट हो सकता है। ऐसा विस्फोट मिनटों में लाखों क्यूबिक पानी छोड़ देगा।

यह बात केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी द्वारा किये गए एक ताजा अध्ययन में सामने आयी हैं। यह अध्ययन वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून, नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट हैदराबाद, जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी दिल्ली, आईआईटी मद्रास, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी रुड़की और अन्य सहयोगी संस्थाओं के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है। यह अध्ययन सैटेलाइट इमेजरी, फील्ड डाटा, मीटरोलॉजीकल उत्तराखण्ड विश्लेषण और हाइड्रोडायनमिक मॉडलिंग के जरिये किया गया है। अध्ययन में पाया गया कि इस झील का 1968 में अस्तित्व ही नहीं था, यह 1980 में बनना शुरू हुई, फिर 2000 तक इसका इसका विकास बहुत धीमी गति से हुआ।

2001 के बाद से इस झील का विस्तार घातक हो गया, तेजी से ग्लेशियर के पतला होने व सिकुड़ने के कारण। हिमनद विस्फोट के कारण ऊपरी हिस्सों में प्रति सेकंड 3,645 क्यूबिक मीटर पानी डिस्चार्ज होगा और वह भी 30 मी। प्रति सेकंड के अधिक वेग से। घुट्टू, घंसाली और भिलंगना हाइड्रोपॉवर स्टेशन एकदम सीधे सैलाब के मार्ग में पड़ते हैं और उनमें बाढ़ की गहराई 8-10 मीटर से अधिक हो सकती है। अध्ययन के अनुसार सड़क, पुल और पॉवर इन्फ्रास्ट्रक्चर को विशेषरूप से खतरा रहेगा। इससे जो जान और माल का नुकसान होगा, उसका अंदाजा स्वतः ही लगाया जा सकता है। गढ़वाल हिमालय में जिला चमोली के तपोवन क्षेत्र में रैनी गांव के निकट 7 फरवरी 2021 की सुबह जो दुखद घटना हुई थी, उसने निश्चितरूप से 2013 की केदारनाथ त्रासदी की याद दिला दी थी। इससे अनेक लोगों की जानें गईं, वहीं 13। 2 मेगावाट ऋषिगंगा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पूरी तरह से बह गया।

धौलीगंगा नदी पर 520 मेगावाट एनटीपीसी हाइड्रो प्रोजेक्ट को आंशिक नुकसान पहुंचा और पानी के तेज बहाव से कम से कम पांच पुलों पर गहरा प्रभाव पड़ा व अनेक गांवों में पानी भर गया था। हाल के महीनों में मसूरी की लंढोर मार्किट में जमीन के धंसने की स्थिति बदतर होती जा रही, जिससे वहां रहने वालों और पर्यटकों की सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। जैन मंदिर और पूर्व कोहिनूर बिल्डिंग के बीच का जो रास्ता लगभग एक फुट धंस गया है, जिससे सड़क पर और पास की इमारतों में चौड़े क्रैक आ गए हैं, जिससे अनेक दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। कुछ दशकों के दौरान उत्तराखंड में चार प्रमुख प्राकृतिक आपदाएं देखने में आयी हैं- 1991 के उत्तरकाशी भूकंप में 768 लोगों की जानें गईं, 1998 के मालपा भूस्खलन में 255 लोग मरे, 1999 के चमोली भूकंप में 100 ज्यादा लोग मरे और 2013 की केदारनाथ बाढ़ में 5,700 से ज्यादा लोग से अधिक लोग चल बसे। फिर 2021 में चमोली की घटना हुई। इन दुखद घटनाओं पर विराम एक ही सूरत में लग सकता है कि पहाड़ों में कोई ‘विकास’ प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले वैज्ञानिकों की राय ले ली जाये, उन्हें अनदेखा न करें।

ये भी पढ़ें–  नवभारत विशेष के लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें 

भारी जनहानि होने की आशंका

उत्तराखंड के केंद्रीय हिमालय क्षेत्र में लगभग 4,750 मी। की ऊंचाई पर भिलंगना ग्लेशियर झील है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण यह झील बहुत तेजी से फैल रही है और अगर यह विस्तार जारी रहा, तो जीएलओएफ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) का गंभीर खतरा भयंकर बढ़ जायेगा। यह बाढ़ अपने रास्ते में आने वाली इमारतों, सड़कों और मानव जीवन को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।

लेख- नौशाबा परवीन के द्वारा

Uttarakhand faces threat of glacier burst

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Published On: Nov 29, 2025 | 12:14 PM

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