

मिड-टर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स ने सीनेट और हाउस पर कब्जा जमाया।
महंगाई, ईरान युद्ध और ट्रंप की नीतियां हार की वजह बनीं।
ऐतिहासिक जीत के साथ कई नए चेहरे अमेरिकी राजनीति में उभरे।
डेमोक्रेट्स अब ट्रंप के फैसलों पर अंकुश लगा सकेंगे।
Trump Midterm Election Setback and Power: अमेरिका के मिड-टर्म चुनाव में नीली सुनामी की वजह से डेमोक्रेटिक पार्टी ने दोनों सीनेट व हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्ज पर ऐतिहासिक नियंत्रण हासिल किया है। यह अमेरिका के वामपंथी इतिहास में सबसे बड़ा भूचाल है। अच्छी मात्रा में फेडरल व स्टेट स्तर पर प्रगतिशील नेताओं ने जीत दर्ज की है, जो कि अरबपतियों पर अधिक कर लगाने, सभी को मेडीकेयर उपलब्ध कराने, श्रमिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखने और इजराइल के नस्लवाद, कब्जे व नरसंहार में अमेरिकी सहयोग पर विराम लगाने के पक्ष में हैं।
ईरान पर थोपा गया बेमतलब का युद्ध भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की हार का बड़ा कारण रहा। जंग व टैरिफ की वजह से जो महंगाई बढ़ी, उससे ट्रंप ने बुजुर्ग श्वेतों व ग्रामीण मतदाताओं के अपने वफादार बेस को खोया। युवा व हिस्पैनिक मतदाता भी उनसे इसलिए छिटके, क्योंकि वह धर्म व नस्ल के आधार पर वोटर्स को विभाजित करने का प्रयास कर रहे थे। हालांकि ट्रंप के कार्यकाल में अभी 2 वर्ष शेष हैं, लेकिन यह वास्तव में ट्रंप व उनकी बेतुकी नीतियों की ही हार है।
ट्रंप ने कहा था कि मतदाता बैलेट पेपर पर प्रत्याशी को नहीं, बल्कि उन्हें देखें। ट्रंप ने अपने जितने भी करीबियों के लिए जमकर प्रचार किया, उन सभी को शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा। चुनाव के नतीजे आते ही स्पष्ट हो गया था कि अमेरिका ने चुना पहली अश्वेत महिला गवर्नर, पहली देशज अमेरिकी महिला गवर्नर, पहला घोषित समलैंगिक पुरुष सीनेटर, पहला मुस्लिम सीनेटर और संभवतः पहला अश्वेत हाउस स्पीकर भी।
ट्रंप की विभाजनकारी नीतियां परास्त हुई। क्या अब अपने शेष कार्यकाल में ट्रंप लंगड़ी बत्तख बनकर रह जाएंगे? इसका उत्तर 'हां' भी है और 'न' भी। ट्रंप जो जजों, राजदूतों का चयन करेंगे उन्हें सीनेट ब्लॉक कर सकता है। हाउस फंडिंग को भी ब्लॉक कर सकता है, विशेषकर युद्ध के लिए पैसे को। सीनेट व हाउस की कमेटियां ट्रंप की हरकतों और प्रशासनिक अधिकारियों की जांच कर सकती हैं, लेकिन दूसरी ओर ट्रंप विधेयकों को वीटो कर सकते हैं, क्योंकि डेमोक्रेट्स के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है। ट्रंप के पास एग्जीक्यूटिव पावर भी बरकरार हैं, विशेषकर विदेश नीति के संदर्भ में।
डेमोक्रेट्स पूंजीपतियों का समर्थन, युद्ध का समर्थन, नरसंहार राजनीति का समर्थन। सब आजमाकर देख चुके हैं और इन सबका घातक सियासी नतीजा निकला है। अब अगर वह टूटी हुई यथास्थिति के मुकाबले पर अच्छा व प्रेरणादायक विकल्प देने में नाकाम रहते हैं, तो नीली लहर जितनी तेजी से ऊपर आई है, उतनी तेजी से ही नीचे चली जाएगी।
डेमोक्रेट्स के लिए अगर कहीं उम्मीद है तो वह लोकतांत्रिक समाजवाद में ही है, जिसकी बदौलत उसे यह सफलता हासिल हुई है। हालांकि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में चीन, इराक व कतर के साथ भारत के कमर्शियल जहाजों के चलने पर से भी पाबंदी हटा ली है, लेकिन दिल्ली को सतर्क रहना चाहिए कि पश्चिम एशिया टकराव में अतिरिक्त जटिलता न आए।
चूंकि विदेश नीति की कमान अब भी ट्रंप के ही पास है, इसलिए अनुमान यह है कि मिडटर्म की शर्मनाक हार से उबरने के लिए ट्रंप भारत से व्यापार समझौता जल्द करने का प्रयास करेंगे, खासकर इसलिए भी कि रूस, चीन व ईरान के विरुद्ध उनकी विदेश नीति बुरी तरह से असफल रही है। ट्रंप को भारत के साथ ट्रेड डील मोर्चे पर जल्द एक जीत चाहिए। 1974 के वाटरगेट चुनाव के बाद किसी भी मुख्य पार्टी के लिए मिडटर्म में यह सबसे शर्मनाक हार है। रिपब्लिकन कुलीनों को जानना चाहिए कि उनकी पार्टी को मागा-स्टाइल प्रोपेगंडा पॉलिटिक्स से छुटकारा पाने की जरूरत है।
ट्रंप की हार से दुनिया के शेष लोकतंत्रों को भी सबक लेना चाहिए। सबसे पहली बात तो यह है कि आम मतदाता के लिए जीडीपी व बाजार से अधिक महत्व यह है कि उसकी जितनी कमाई हो रही है, उसमें उसके घर का खर्च सही व इज्जत के साथ चल रहा है या नहीं। जीडीपी का महत्व है, लेकिन जब उसे प्रति व्यक्ति आय के स्तर पर महसूस किया जाए, वर्ना लोग यही समझेंगे कि रईस अधिक रईस हो रहे हैं और वह इसके लिए आपको सजा देंगे। विचारधारा भी अर्थहीन हो जाती है जब मतदाताओं को पेट की आग सताने लगती है
लेख- शाहिद ए चौधरी के द्वारा