

Mercator Map Global Politics: संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 457 साल पुराने मर्केटर प्रोजेक्शन मैप की जगह 'इक्वल अर्थ कार्टोग्राफिक प्रोजेक्शन' नक्शा अपनाने का प्रस्ताव महज तकनीकी या मानचित्र संबंधी सुधार नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, शक्ति-संतुलन के इतिहास की महागाथा है।
पहली नजर में यह भूगोल की किताबों से जुड़ा मामूली सुधार लगेगा, लेकिन इसके पीछे भूगोल, इतिहास, उपनिवेशवाद, वैश्विक और राष्ट्रीय संप्रभुता की कई परतें हैं। 164 देशों का समर्थन, अमेरिका का अकेला विरोध और 6 देशों की मतदान से विमुखता बताती है कि नक्शा केवल धरती की तस्वीर नहीं होता, वह दुनिया को देखने का एक नजरिया भी बनाता है। अमेरिका नए मानचित्र के प्रस्ताव का अकेला विरोधी है।
अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेंसेविच का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र को वैश्विक शांति और सुरक्षा जैसे वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए न कि 16वीं सदी के नक्शे में बदलाव पर समय नष्ट करना चाहिए। आज की दुनिया में नक्शे केवल दीवारों पर नहीं हैं, वे स्कूलों, समाचार माध्यमों, डिजिटल प्लेटफॉर्मों, डाटा विजुअलाइजेशन और नीति निर्माण में हमारी मानसिक दुनिया बनाते हैं।
इसलिए अमेरिकी विरोध वैज्ञानिक रूप से क्षेत्रफल की विकृति को नकार नहीं सकता। अमेरिका जानता है कि भूगोल का यह दृश्य बदलाव वैश्विक धारणाओं को बदलेगा। जब दुनिया के सामने अफ्रीका का विशालकाय रूप उभरेगा, तो उसकी विशाल संसाधन क्षमता, जनसांख्यिकीय लाभांश और आर्थिक संभावनाओं को कम आंकना नामुमकिन हो जाएगा।
मतदान प्रक्रिया से दूरी बनाने वाले 6 देशों, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन की अपनी अलग रणनीतिक मजबूरियां हैं। पूर्वी यूरोप के यह देश वर्तमान में रूस-यूक्रेन युद्ध और भू-राजनीतिक अस्थिरता के मुहाने पर खड़े हैं। अमेरिका पर उनकी अत्यधिक निर्भरता के कारण वे ऐसे किसी भी प्रस्ताव के पक्ष में खड़े होकर अमेरिका को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे, जिस पर अमेरिकी आका की असहमति हो।
सच है कि कोई भी द्वि-आयामी नक्शा त्रि-आयामी गोल पृथ्वी को शत-प्रतिशत सटीक रूप में नहीं ढाल सकता। नौवहन, वायुयान चालन के लिए दिशा-सटीकता हेतु मर्केटर की उपयोगिता हमेशा बनी रहेगी। इक्वल अर्थ मॉडल भी पूर्ण नहीं है। वह क्षेत्रफल को बेहतर दिखाता है, लेकिन आकार, दूरी और दिशा में कुछ विकृतियां रखता है। ऐसे में भविष्य में किसी और मानचित्र सुधार की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
भारत का रुख इसी जटिलता को समझाता है। भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में इसलिए मतदान किया, क्योंकि क्षेत्रफल का अधिक संतुलित और वैज्ञानिक प्रतिनिधित्व सिद्धांततः उचित है। इस नए नक्शे में भूमध्य रेखा के समीप होने के कारण भारत का दृश्य आकार पहले से थोड़ा बेहतर और बड़ा नजर आता है। इस समर्थन के 2 दिन बाद भारत ने साफ कर दिया कि उसका समर्थन केवल 'समान क्षेत्रफल प्रदर्शन' के मूल सिद्धांत के लिए है न कि किसी खास प्रोजेक्शन या मानचित्र का अनुमोदन, जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख समेत भारत का संप्रभु क्षेत्र भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप ही दिखाया जाना चाहिए।
यदि इस नए मानचित्र या इसके डिजिटल रूपांतरणों में केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को भारत के आधिकारिक मानचित्र के विपरीत गलत या भ्रामक ढंग से पाकिस्तान या चीन के हिस्सों के रूप में दिखाया गया, तो भारत इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा। भारत का यह रुख उसकी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता पर गैर-समझौतावादी नीति को दर्शाता है।
आज की दुनिया में नक्शे केवल दीवारों पर नहीं हैं, वे स्कूलों, समाचार माध्यमों, डिजिटल प्लेटफॉर्मों, डाटा विजुअलाइजेशन और नीति निर्माण में हमारी मानसिक दुनिया बनाते हैं। इसलिए अमेरिकी विरोध वैज्ञानिक रूप से क्षेत्रफल की विकृति को नकार नहीं सकता।
लेख-संजय श्रीवास्तव द्वारा