नवभारत विशेष: लिव-इन में भी मिलेगी 498A की सुरक्षा? सुप्रीम कोर्ट ने बताया शादी जैसा संबंध साबित करने की शर्त

Section 498A Live-in: सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन संबंधों में भी वैवाहिक क्रूरता के मामलों में 498A के प्रावधानों की संभावित लागूता पर अहम टिप्पणी की है। महिला को संबंध का वैवाहिक स्वरूप साबित करना होगा।
Supreme Court ruling on Section 498A in live-in relationships
लिव-इन संबंध में सुप्रीम कोर्ट 498A फैसलाफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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498A Live-in Marriage Intent: सुप्रीम कोर्ट ने सेक्शन 498ए का विस्तार लिव-इन संबंधों के लिए भी किया है। लेकिन महिला को साबित करना होगा कि शादी का इरादा था। यह करना आसान न होगा। पहले यह जान लेते हैं कि वैवाहिक क्रूरता क्या है? इस 2016 के केस के केंद्र में आईपीसी की धारा 498ए की व्याख्या थी (जो अब बीएनएस, 2023 की धारा 85 है), जिसके तहत पति या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा उसकी पत्नी के साथ क्रूरता करना दंडनीय अपराध है। कानून दो प्रकार की वैवाहिक क्रूरता को मान्यता प्रदान करता है।

एक-शारीरिक या मानसिक यातना अथवा दहेज हासिल करने के लिए दबाव। दो कोई भी ऐसा व्यवहार, जिससे पत्नी को गंभीर चोट पहुंचे या वह आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाए, अदालत के समक्ष जो मामला था, उसमें आरोपी ने अपनी पहली शादी को छुपाकर दूसरी शादी कर ली थी। इसके बाद वह और उसकी दूसरी पत्नी घरेलू व सामाजिक जिम्मेदारियां साथ निभाने लगे। जब इस महिला ने 6 वर्ष बाद क्रूरता की शिकायत दर्ज कराई तो आरोपी की प्रतिक्रिया यह थी कि उक्त कानून उस पर लागू नहीं होगा, क्योंकि उनका 'वैध विवाह' नहीं था।

498A में अवैध विवाह भी शामिल, कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

हिंदू कानून में बहुपत्नी विवाह को मान्यता प्राप्त नहीं है। लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना कि सेक्शन 498ए को लागू करने के लिए 'वैध विवाह' आवश्यक शर्त नहीं है। इसके तहत शून्य विवाह (मसलन, बहुपत्नी, अपने रक्त संबंधों में विवाह, डर या दबाव में की गई शादी) और शादी जैसे रिश्ते भी कवर होंगे।

कर्नाटक हाईकोर्ट की इस विस्तृत व्याख्या से आरोपी व केंद्र सरकार सहमत नहीं थे। उनका तर्क था कि 'पति' केवल उसे माना जा सकता है, जो वैध रूप से विवाहित पुरुष हो, उसके अतिरिक्त कोई 'पति' नहीं हो सकता।

दूसरी ओर कर्नाटक सरकार व संबंधित महिला का तर्क था कि पुरुष को अपनी ही गलतियों का लाभउठाने नहीं दिया जा सकता कि वह पहले धोखे से अवैध विवाह करे और फिर उस महिला पर जुल्म करे। अदालत ने कहा कि सेक्शन 498ए का उद्देश्य पति या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा घर की महिला के विरुद्ध 'निंदनीय व्यवहार' को रोकना है और स्वाभाविक रूप से यह बात 'शादी जैसे रिश्तों' पर भी लागू होती है।

सुप्रीम कोर्ट की नई शर्त से लिव-इन में महिलाओं की राह कठिन?

सुप्रीम कोर्ट की जो नई रूलिंग है, उसके तहत दोष सिद्ध होने पर अब आरोपी को सजा भी हो सकती है। इसका अर्थ हुआ कि लिव-इन संबंधों में अब नागरिक राहत के साथ दंडात्मक राहत भी है। लेकिन 498ए के तहत राहत पाने के लिए महिला को साबित करना होगा

1 संबंध शादी जैसा था और 2 इरादा शादी करने का था। अदालतें संबंध के साक्ष्य के रूप में अनेक तत्वों को देख सकती हैं- इरादा, संग रहने की अवधि, लिव-इन व एक ही घर को चलाना, वित्तीय संसाधनों की पूलिंग, यौन संबंध होना, बच्चों की परवरिश और समाज में ऐसे पेश आना जैसे विवाहित हों।

क्या शादी का इरादा था? यह तथ्य का प्रश्न है और इसे अनेक तरह से साबित किया जा सकता है। अदालत द्वारा खड़ा किया गया परीक्षा का यह कांटा अस्पष्ट है और महिला शिकायतकर्ताओं को इससे परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। शादी जैसी स्थितियों में महिलाओं को क्रूरता से सुरक्षित रखने में 'शादी का इरादा' की शर्त रोड़ा बन सकती है। 'शादी के इरादे' की सख्त शर्त बेमेल प्रतीत होती है। सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम फैसले में कैजुअल लिव-इन संबंधों को कवर नहीं किया गया है।

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महिला पार्टनर के लिए परेशानी

डॉ. लोकेश बीएच बनाम कर्नाटक राज्य में 3 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट की 2 न्यायाधीश वाली खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि 'वैवाहिक क्रूरता' से सुरक्षा के प्रावधान का विस्तार उन महिलाओं के लिए भी होगा, जो 'शादी जैसे रिश्ते में हैं'। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल उन लिव-इन जोड़ों पर लागू होगा, जिनका इरादा शादी करने का है।

-लेख डॉ. अनिता राठौर के द्वारा

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