नवभारत संपादकीय: राज्यसभा चुनाव में क्रॉसवोटिंग चिंताजनक, विपक्ष की एकजुटता पर फिर सवाल

Rajya Sabha Crossvoting: बिहार, ओडिशा और हरियाणा के राज्यसभा चुनावों में क्रॉसवोटिंग ने विपक्ष की एकजुटता और अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
Navbharat Editorial: Cross-voting in Rajya Sabha Elections is Alarming; Opposition Unity Questioned Once Again
Rajya Sabha Election Crossvoting ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Rajya Sabha Election Crossvoting: बिहार, ओडिशा व हरियाणा में हाल ही हुए राज्यसभा चुनावों ने फिर एक बार राजनीति की कमजोरी उजागर कर दी। विपक्षी पार्टियों में अनुशासन व एकता नहीं होने से चुनावी गणित बिगड़ जाता है। आपसी विश्वास की जगह शक ले लेता है और क्रॉसवोटिंग की वजह से विपक्षी उम्मीदवार को हार का मुंह देखना पड़ता है।

बिहार में 6 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव था। सत्तारूढ़ गठबंधन और उसके सहयोगियों के लिए अनुकूल स्थिति थी। इतने पर भी कुछ विधायकों ने क्रॉसवोटिंग करते हुए तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले विपक्षी समूह की रही-सही उम्मीदों को चौपट कर दिया।

सिर्फ यह संख्यात्मक गणित नहीं, बल्कि विपक्ष की तथाकथित एकजुटता में आए खोखलेपन को दर्शाता है। स्वयं कांग्रेस को राज्य इकाई में भी आंतरिक अनुशासन का अभाव है, जिसकी वजह से नाजुक मौके पर विपक्षी मोर्चे की रणनीति कमजोर होकर बिखर गई।

ऐसी ही हालत ओडिशा में भी हुई। वहां राज्यसभा की 3 सीटों के लिए चुनाव था। यद्यपि वहां बीजेपी मजबूत स्थिति में थी लेकिन फिर भी निष्ठा को त्यागकर पार्टी लाइन से हटकर विधायकों ने मतदान किया, क्रॉसवोटिंग होकर रही।

यद्यपि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने अपने विधायकों को सुदूर होटलों व रिसोर्ट में रोक रखा था ताकि प्रतिपक्षी उन्हें खरीद न पाएं। इतने पर भी वोट इधर-उधर होकर रहे। हरियाणा में हुए राज्यसभा चुनाव में 5 कांग्रेस विधायकों ने क्रॉसवोटिंग की।

विगत वर्षों से देखा जा रहा है कि राजनीतिक पार्टियों को अपने ही विधायकों पर विश्वास नहीं रह गया है। वह चुनाव में पलटी न मार दें इसलिए उन्हें उनके घर या राजधानी से दूर ले जाकर निगरानी में रखा जाता है।

बाद में क्रॉसवोटिंग होने पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं। विपक्ष का आरोप रहता है कि सत्तापक्ष ने प्रलोभन दिया और वोटों का सौदा किया। इसके जवाब में सत्तारूढ़ पार्टी कहती है कि विपक्ष अपने खेमे को संभाल नहीं पाया और उसका संगठन कमजोर रहा।

धनशक्ति का इस्तेमाल करने, पिछले दरवाजे से सौदेबाजी करने तथा विचारधारा से समझौता करने के आरोप लगते रहते हैं। इससे सवाल उठता है कि विपक्ष अपने को एकजुट क्यों नहीं रख पाता और सत्ता पक्ष के खिलाफ उसका संयुक्त मोर्चा दिखावा बनकर क्यों रह जाता है? विपक्षी सदस्यों की अपनी पार्टी के प्रति वफादारी कहां चली जाती है? क्या पैसे का मोह उनका इंसान डिगा देता है? पार्टियां अपने विधायकों में निष्ठा पैदा करने पर ध्यान क्यों नहीं केंद्रित करतीं? बिहार व ओडिशा के राज्यसभा चुनाव में जो हुआ वह देश की ढुलमुल राजनीति को दर्शाता है कि पार्टी के अनुशासन की किस तरह धज्जियां उड़ाई जाने लगी हैं तथा अवसरवाद कितना बढ़ता जा रहा है। क्या ऐसे लोग लोकतंत्र को घोड़ाबाजार नहीं बना देते?

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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