

नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, एक वक्त ऐसा था जब बादशाहों को अपना तख्त प्रिय था, जबकि आज हर नेता को कुर्सी प्यारी लगती है। कुर्सी की मादकता में खुद को जनसेवक कहने वाले नेता सत्ता के स्वामी बन जाते हैं कुर्सी पाने के बाद उसे बचाए रखने की चिंता लगी रहती है।' हमने कहा, 'कुर्सी तो हर घर औरऑफिस में रहती है। उसमें कौन सी अनोखी बात है? पहले कुर्सी लकड़ी की होती थी अब मेटल की होती है। कंप्यूटर पर काम करने वालों की कुर्सी पहिए वाली हुआ करती है। बुजुर्गों के लिए इजी चेयर या आराम कुर्सी रहती है। कुर्सी कैसी भी हो, उसके पाए मजबूत रहने चाहिए। कुर्सी में हत्थे लगे रहने से कुहनी और कलाई टिकाई जा सकती है। कुर्सी क्लर्क की भी होती है और साहब की भी!'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, छोटी कुर्सी वाला हमेशा बड़ी कुर्सी पाने की चाहत रखता है। इतिहास की समूची कालसूची स्वर्णमंडित कुर्सियों की लोलुप आकांक्षाओं से भरी पड़ी है। अजातशत्रु ने अपने पिता बिंबिसार को बंदी बनाकर स्वयं का राजतिलक करवाया था। कुर्सी के लिए सम्राट अशोक ने अपने भाइयों को मौत के घाट उतार दिया था। कंस ने अपने पिता उग्रसेन को तथा औरंगजेब ने अपने अब्बा शाहजहां को जेल में डाल दिया था।'
हमने कहा, 'लोकतंत्र में कुर्सी पाने की होड़ बढ़ गई है। चुनाव संगीत कुर्सी का खेल बन गए हैं, जिसमें चालाक नेता जल्दी से लपककर कुर्सी पर बैठ जाते हैं और खुद को निर्विरोध निर्वाचित बताते हैं। कुर्सी पर बैठते ही कुछ नेता तानाशाह के समान मदमस्त आचरण करने लगते हैं। व्हाइट हाउस की सफेदी से ट्रंप का दिल नहीं भरा, इसलिए अब वह ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते हैं। ईरान पर भी टूट पड़ने का उनका इरादा है। वह यह नहीं समझते कि जब समय प्रतिकूल हो जाता है, तो सत्ता का पावर मुट्ठी में भरी रेत के समान खिसक जाता है। कुर्सी किसी की सगी नहीं होती। कल उस पर कोई और था, आज दूसरा विराजमान है, भविष्य में कोई और बैठेगा। यह है किस्सा कुर्सी का !'
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा