नवभारत संपादकीय: महंगाई की बढ़ती मार करने लगी लाचार, पेट्रोल-डीजल फिर महंगे! क्या अभी और बढ़ेंगे दाम?

Petrol Diesel Hike: क्रूड ऑयल की कीमतों, तेल कंपनियों के घाटे और वैश्विक संकट के बीच पेट्रोल-डीजल महंगे हुए। बढ़ती महंगाई अब आम जनता की बड़ी चिंता बनती जा रही है।
Navabharat Editorial: The Rising Burden of Inflation Leaves People Helpless—Petrol and Diesel Prices Rise Again! Will Rates Climb Even Higher?
महंगाई की बढ़ती मार(सोर्स: सौजन्य AI)
Updated on

India Fuel Price Increase: प्रधानमंत्री की देशवासियों से पेट्रोलियम पदार्थों का इस्तेमाल कम करने की अपील के कुछ दिन बाद पेट्रोल व डीजल के दाम 3 रुपए प्रति लीटर बड़ा दिए गए, अप्रैल में भारत में क्रूड आयल के दाम 114।48 डॉलर प्रति बैरल थे जो मई में कुछ घटकर 106।18 डॉलर प्रति लीटर हो गए, पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस पर तेल कंपनियों का घाटा प्रति माह 30,000 करोड रुपए हो रहा है। इसलिए आगे चलकर और मूल्यवृध्दि की जा सकती है। देश में महंगाई तेजी से बढ़ रही है।

जो जनता की चिंता का विषय है। अप्रैल में थोक मूल्य सूचकांक 8।3 प्रतिशत पर चला गया जो 42 महीनों में सर्वाधिक है। होमुंज की नाकाबंदी की वजह से पेट्रोल, डीजल व सीएनजी के दाम में वृध्दि होनी ही थी, अमेरिका व यूएई ने भी अपने यहां इन पदाथों के दाम 40 प्रतिशत बढ़ा दिए हैं।

हाल ही में ईरान ने घोषणा की कि उसने 30 तेलवाही जहाजों को होर्मुन खाड़ी से जाने दिया। इससे कुछ राहत मिलेगी लेकिन युध्द के पूर्व इस खाड़ी से रोज 130 जहाज निकला करते थे। यदि आगे चलकर भी क्रूड के दाम प्रति बैरल 100 डॉलर के ऊपर बने रहे तो कीमत फिर से बढ़ाई जा सकती है।

यह खबर कुछ सुकून देती है कि प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के बाद अबू धाबी भारत को एलपीजी की दीर्घकालिक आपूर्ति व 5 अरब डॉलर निवेश करने को राजी हो गया है। इस दौरान महंगाई चौतरफा वार कर रही है। जिससे मध्यम वर्ग और सीमित आमदनी वाले लोगों की चिंता बढ़ गई है। देश में बेरोजगारी भी 6 माह के उच्च स्तर पर 5.2 प्रतिशत पर जा पहुंची है।

यह बात सही है कि भारत की अर्थव्यवस्था और विकास दर को पश्चिम एशिया संकट से करारा झटका लगा है। खाने का तेल भी 20 रुपया मंहगा हो गया। मेवा से लेकर किराणा तक महंगाई की चपेट में है। दूध के दाम में 2 रूपए प्रतिलीटर का इजाफा हो गया। इससे सामान्य जन की मुश्किलें बढ़ना तय है। अब बड़ा सवाल शादी-ब्याह के सीजन में सोना नहीं खरीदने का है।

देशहित को देखते हुए लोग अपने घर में मौजूद पुराने सोने का ही इस्तेमाल करें तो बेहतर होगा। सरकार को देखना होगा कि कहीं सराफा व्यापारी और उनके कर्मचारियों पर बेकारी का संकट न आ जाए। दूसरी ओर ऐसे मौके पर स्वर्ण की तस्करी पर हर तरह से रोक लगानी होगी क्योंकि जिस चीज के लिए मनाही की जाती है, उसकी स्मगलिंग बढ़ जाती है।

विदेशी मुद्रा कोष में गिरावट तथा डॉलर के मुकाबले रुपया 96 के पार जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आर्थिक संकट कितना बड़ा है। अब भारत निर्यात के नए बाजार खोजने, व्यापार समझौते बढ़ाने के लिए प्रयास करे, अमेरिकी दबाव में न आते हुए रूस से तेल खरीद का दीर्घकालिक समझौता करे।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

Navbharat Live
navbharatlive.com