Lok Sabha Speaker Controversy ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Lok Sabha Speaker Controversy: विपक्ष अपनी अनुशासहीनता के चलते नियमों के पर्याय लोकसभा अध्यक्ष पर ही निर्मूल आरोप लगाता है तो उसकी परिणति ऐसी ही होती है। अब तक भारतीय लोकतांत्रिक परंपराएं 76 वर्ष की यात्रा पूर्ण कर चुकी हैं। वरिष्ठ नेताओं की तीखी बहसें, आरोप-प्रत्यारोप, विरोध और असहमतियों के लंबे विमर्श लोकसभा और राज्यसभा के गौरवशाली अतीत में दर्ज हैं।
कुछ अप्रिय घटनाक्रम भी हुए लेकिन नियमों और मान्य परंपराओं की मर्यादाओं को कभी जानबूझ कर ओझल नहीं होने दिया गया। सत्ता पक्ष और विपक्ष ने एक-दूसरे की सहमति और असहमति का सदैव सम्मान और आदर किया है।
फिर अब ऐसा क्या हुआ कि विपक्ष आक्रामकता के चरम पर पहुंच कर मर्यादाओं का ध्यान नहीं रख रहा है? यह प्रश्न सामयिक है और इस पर चिंतन होना चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के अध्यक्षीय कार्यकाल को देखें तो पाएंगे कि विपक्ष के जिद्दी और आक्रामक रवैये के क्षणों में भी उन्होंने अकल्पनीय संयम, संतुलन और निष्पक्षता का परिचय दिया है।
वे नियमों के पालन के प्रति सजग थे और यही सजगता विपक्ष को खटकती रही। अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में ओम बिड़ला ने निरंतर यह प्रयत्न किया है कि अधिक से अधिक सांसदों को सदन में बोलने का अवसर मिले, युवा सांसदों, पहली बार निर्वाचित होकर आए जनप्रतिनिधि को, महिला सांसदों और संख्या में कम सांसदों को भी पर्याप्त समय देना सुनिश्चित किया गया।
ऐसा होने पर ही 17 वीं लोकसभा ने लगभग 97 प्रतिशत की कार्य उत्पादकता हासिल की है। अपने कार्यकाल में नियमों और प्रक्रियाओं को समृद्ध करने की लोकसभा अध्यक्षों की परंपरा को अग्रसर करते हुए ओम बिड़ला ने नव निर्वाचित सांसदों के लिए प्रबोधन कार्यक्रम आयोजित
कर उन्हें संसदीय प्रक्रिया, नियमों और संसदीय परंपराओं से परिचित करवाया।
लोकसभा के संसदीय शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान ‘प्राइड के माध्यम से विभिन्न विधानसभाओं तथा संसद के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, समिति प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से पीठासीन अधिकारियों की एक समिति का गठन भी किया गया, जिसका उद्देश्य संसद तथा राज्य विधानसभाओं की समिति व्यवस्था की समीक्षा करना है।
ओम बिरला के नेतृत्व में लोकसभा को ‘पेपरलेस’ बनाने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य हुआ है। डिजिटल संसद प्लेटफॉर्म की स्थापना, सांसदों के लिए डिजिटल अटेंडेंस प्रणाली और ऑनलाइन ऑनबोर्डिंग जैसी व्यवस्थाएं इसी परिवर्तन का हिस्सा हैं।
मंत्रियों द्वारा सदन में दिए गए आश्वासनों की निगरानी के लिए ‘ऑनलाइन एश्योरेंस मॉनिटरिंग सिस्टम’ को भी सशक्त किया गया, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही में वृद्धि हुई है।
संसदीय कार्यवाही में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। इस तकनीक के माध्यम से संसद की 18,000 से अधिक घंटों की ऐतिहासिक कार्यवाही का डिजिटलीकरण किया गया, इसके बाद भी यदि संसद में उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, तो यह सिर्फ एक प्रक्रिया भर नहीं है बल्कि संसदीय परंपराओं पर ही प्रश्नचिह्न है। विपक्ष का यह व्यवहार लोकतांत्रिक संसदीय मर्यादाओं के अनुकूल नहीं है।
भारतीय संसदीय प्रक्रिया उन मानक प्रक्रियाओं में सम्मलित हैं जिसका अनुकरण पूरी दुनिया के लोकतंत्र करते हैं। बीते कुछ वर्षों में विपक्ष ने जिस व्यवहार का प्रदर्शन किया है, वह कार्यवाहियों में बाधा ही नहीं अपितु लोकतंत्र को ठेस पहुंचाने वाला कार्य है।
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लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के विरुद्ध लाया गया विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव सदन में खारिज हो गया। संसद नियमों और मान्य परंपराओं से संचालित होती हैं। वह विपक्ष या सत्ता पक्ष की मन-मर्जियों से संचालित नहीं हो सकती।
लेख- मध्य प्रदेश विधानसभा, अध्यक्ष, नरेंद्र सिंह तोमर के द्वारा