पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, कुछ लोग अपनी कार के लिए लाखों रुपए में विशेष नंबर खरीदकर खास बन जाते थे. आपने 1111 या 7777 नंबर की गाड़ी देखी होगी तो लगा होगा कि यह नंबर कैसे मिल गया? गाड़ी के मालिक ऐसा मनपसंद नंबर नीलामी में मोटी रकम देकर खरीदते थे. इससे देखने वालों पर रोब जमता था कि जब गाड़ी का नंबर इतना विशिष्ट है तो इसका मालिक भी खास होगा.’’ हमने कहा, ‘‘यदि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामले में एमिकस क्यूरी (अदालत मित्र) मनोज स्वरूप की रिपोर्ट मंजूर कर ली तो गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन प्लेट की लाखों रुपए में नीलामी बंद हो सकती है. अदालत मित्र का कहना है कि मोटर वाहन एक्ट 1988 के अनुसार वाहन के रजिस्ट्रेशन के लिए राज्य सरकार वही फीस ले सकती है जो केंद्र सरकार तय करेगी.
राज्यों को रजिस्ट्रेशन नंबर देने के लिए केंद्र द्वारा तय की गई फीस से ज्यादा शुल्क लेने का अधिकार नहीं है. अदालत मित्र की 23 पृष्ठों की रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य की वाहन पंजीकरण अथारिटी गाड़ी का जो रजिस्ट्रेशन नंबर देती है, उसकी फीस समूचे देश में एक समान है.’’ पड़ोसी ने कहा ‘‘निशानेबाज, अगर ऐसा हुआ तो कोई अपनी गाड़ी के खास नंबर को लेकर इतरा नहीं सकेगा. क्यू में जिसको जो नंबर मिल गया सो मिल गया! किसी खास नंबर को नीलामी के लिए आरक्षित नहीं किया जा सकेगा. यह मामला इसलिए शुरू हुआ क्योंकि मध्यप्रदेश में एक वाहन को एमपी केएल-4646 नंबर मिला. अथारिटी ने कहा कि यह नंबर खास तरह का है. इस विशिष्ट नंबर के लिए उसे अलग से शुल्क देना होगा. वाहन मालिक ने फीस देने से इनकार कर दिया. यह मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में गया.
तब हाईकोर्ट ने अथारिटी के आदेश को गलत बताते हुए कहा कि उसे किसी खास नंबर के लिए अधिक पैसा लेने का अधिकार नहीं है. हाईकोर्ट के इस फैसले को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अदालत मित्र की रिपोर्ट मांगी.’’ हमने कहा, ‘‘अब यदि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि करता है तो फिर खास नंबरों की नीलामी बंद हो जाएगी. फिर ऐसे खास नंबर वाले भी सारी ठसन भूलकर आम हो जाएंगे. पैसों के जोर पर विशिष्ट नंबर खरीदना बंद हो जाएगा. स्पेशल लोगों के स्पेशल नंबर वाली बात ही नहीं रह जाएगी. फिर लाखों रुपए में खास नंबर की प्लेट लगाकर कोई खुद को तोपचंद साबित नहीं कर पाएगा.’’