

NCP Factions Political Future: आखिर दोनों राष्ट्रवादी कांग्रेस की भावी दिशा क्या होगी ? शरद पवार ने स्पष्ट कह दिया कि हम कहीं जाएंगे नहीं। जिसे भी आना है हमारे साथ आए, उनके इस कथन से एनसीपी या राकांपा के दोनों गुटों में विलीनीकरण की चर्चा को पूर्ण विराम लग गया है। अजीत पवार गुट बीजेपी के साथ सत्ता में सहभागी है और उसकी ताकत कायम है। सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री का पद हासिल है। ऐसी स्थिति में उनके गुट के सत्ता छोड़कर शरद पवार के गुट में शामिल होने की कोई संभावना नजर नहीं आती।
अजीत पवार गुट के नेता सुनील तटकरे ने शरद पवार के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि हम एनडीए के घटक हैं और आगे भी बने रहेंगे। अजीत पवार की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद उनके गुट में आपसी विवाद देखा जा रहा है। पार्थ पवार पार्टी की बागडोर अपने पास रखना चाहते हैं। उन्होंने प्रफुल पटेल व सुनील तटकरे जैसे नेताओं को दूर ही रखा है।
चुनाव आयोग को भेजी गई पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की सूची में पटेल व तटकरे का नाम ही नहीं था। यह बात सामने आने पर पार्टी की अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने इसे प्रशासकीय गलती बताया। तब से 4 महीने बीत गए लेकिन यह गलती अब तक दुरुस्त नहीं की गई। पार्टी सत्ता में सहभागी होने की वजह से एनसीपी का बड़ा गुट अजीत पवार के गट में है। यदि शरद पवार के साथ जाने में सत्ता का लाभ होता नजर आया तो यही लोग उनके साथ चले जाएंगे।
इस समय सत्ता में सहभागी होने पर भी जितना महत्व उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को है उतना सुनेत्रा पवार को मिलता दिखाई नहीं दे रहा है। अजीत पवार की बात और दबदबा कुछ अलग ही था। बीजेपी की शर्त बताई जाती है कि एनसीपी के दोनों गुटों का एकीकरण होने तक शरद पवार को एनडीए में प्रवेश नहीं दिया जाएगा।
शरद पवार गुट के प्रथम पंक्ति के नेताओं के अनुसार अजीत पवार के निधन के बाद एनसीपी के दोनों गुटों का विलीनीकरण होने की चर्चा थी व घोषणा की तारीख भी तय हो गई थी लेकिन अजीत पवार गुट के नेता शुरू से ही विलीनीकरण के खिलाफ थे। इस समय देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ माहौल बना हुआ है लेकिन पार्टी की बैठक में शरद पवार ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा।
परिसीमन विधेयक को समर्थन देने की पार्टी की कथित तैयारी तथा प्रधानमंत्री मोदी का अक्टूबर में नियोजित बारामती दौरा देखते हुए शरद पवार की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगा है। ऐसा लगता है कि वह अपने तरीके से बीजेपी को संतुष्ट रखना चाहते हैं। यद्यपि उनके वक्तव्य से अर्थ निकलता है कि वह एनडीए में शामिल नहीं होना चाहते लेकिन उनके बयान और कदमों में हमेशा विरोधाभास देखा गया है। वह अप्रत्याशित रूप से कोई कदम उठा लेते हैं।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा