

US Saudi Nuclear Deal: अमेरिका के ऊर्जा सचिव क्रिस राइट और सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुल अजीज बिन सलमान ने 22 जुलाई को नागरिक परमाणु सहयोग समझौते और द्विपक्षीय परमाणु बचाव समझौते पर हस्ताक्षर किए, यह समझौता दोनों देशों के बीच 30 वर्ष की मल्टी-बिलियन परमाणु पार्टनरशिप की बुनियाद रखेगा।
अमेरिकी कंपनियां रियाद को अपना परमाणु क्षेत्र विकसित करने में मदद करेंगी। इसके अगले ही दिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा कि समझौता सऊदी अरब के अन्नाहम एकॉर्ड में शामिल होने पर निर्भर करता है, जिसका अर्थ है सऊदी अरब इजराइल के साथ संपूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करे।
इसके बाद व्हाइट हाउस ने कहा कि 'डील इज ऑफ' (समझौता रद्द समझो) अगर सऊदी अरब एकॉर्ड में शामिल नहीं होता है। ट्रंप की शर्त से स्पष्ट है कि वह यूएई की तरह सऊदी अरब को भी इजराइल के खेमे में लाना चाहते हैं और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के मुकाबले में खाड़ी में अपना परमाणु कार्यक्रम खड़ा करना चाहते हैं।
पाकिस्तान की खाड़ी देशों में परमाणु शक्ति होने के कारण ही पैठ है, जिसे वॉशिंगटन सीमित करना चाहता है। डील में कहा गया है कि अमेरिका से सऊदी अरब नागरिक परमाणु मटेरियल, टेक्नोलॉजी व उपकरण ट्रांसफर किया जाएगा।
जब सऊदी अरब अपना परमाणु इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना शुरू करेगा तो अमेरिकी कंपनियों को उसमें प्राथमिकता दी जाएगी। अप्रसार विशेषज्ञों ने परमाणु ऊर्जा के इच्छुक देशों के लिए इस डील को 'गोल्ड स्टैंडर्ड' माना था।
शुरुआत में परमाणु ईंधन सऊदी अरब को निर्यात किया जाएगा। लेकिन डील में प्रस्ताव है कि 2 वर्ष तक रियाद के लिए संयुक्त रूप से संवर्धन के मूल्य व कमर्शियल व्यवहार्यता का अध्ययन किया जाएगा।
अगर अध्ययन में स्थानीय संवर्धन की जरूरत महसूस की जाती है, तो अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन ईकाई स्थापित करेंगी व उसका संचालन करेंगी। समझौते के अनुसार सऊदी अरब को इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के अतिरिक्त प्रोटोकॉल को अपनाने की जरूरत नहीं है।
सवाल यह है कि सऊदी अरब को परमाणु कार्यक्रम क्यों चाहिए? एक दशक पहले सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने कहा था कि रियासत को तेल के प्रति अपने मोह को छोड़ना पड़ेगा। उन्होंने एक विजन डॉक्यूमेंट को प्रोत्साहित किया कि अर्थव्यवस्था को विविध किया जाए और तेल व गैस पर निर्भरता को कम किया जाए।
विजन 2030 में पर्यटन को प्रोमोट करना, मेगा प्रोजेक्ट्स का निर्माण करना, टॉप-क्लास वित्तीय सेक्टर विकसित करना और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डाटा सेंटर निर्मित करना शामिल हैं। इस समय सऊदी अरब बिजली निर्माण के लिए बहुत अधिक तेल व गैस जलाने पर निर्भर है।
सऊदी अधिकारी लंबे समय से यह कहते आ रहे हैं कि जब उनके पास यूरेनियम अयस्क की भरमार है, तो क्यों न परमाणु ईंधन से बिजली का उत्पादन किया जाए और आर्थिक विविधता योजना को आगे बढ़ाया जाए।
एमबीएस वर्षों से इस प्रयास में थे कि अमेरिका से नागरिक परमाणु समझौता हो। उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्र में उनका प्रतिद्वंदी ईरान अगर परमाणु बम बनाता है, तो सऊदी अरब को भी परमाणु बम बनाना पड़ेगा।
अमेरिका व ईरान के बीच युद्ध चलते ही चला जा रहा है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई समझौता होता हुआ नजर नहीं आ रहा है, इसलिए सऊदी अरब पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है कि अपना परमाणु कार्यक्रम स्थापित करने की योजना को फास्ट ट्रैक किया जाए।
दूसरी ओर अमेरिका के परमाणु उद्योग को इस समझौते से जबरदस्त लाभ हो सकता है। इस समय जब सऊदी अरब पर ईरान व हुती मिसाइल व ड्रोन से हमले कर रहे हैं तो ट्रंप रियाद को आश्वासन देना चाहते हैं कि अमेरिका से पार्टनरशिप में ही उसकी रक्षा व भलाई है।
लेख- शाहिद ए चौधरी के द्वारा