नवभारत संपादकीय: विशेष अदालत का ऐतिहासिक फैसला, तेज जांच और मजबूत चार्जशीट, 59 दिन में दोषी को मिली मौत की सजा

Narsapur Death Sentence: नरसापुर में साढ़े तीन साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में विशेष अदालत ने 59 दिनों के भीतर फैसला सुनाते हुए दोषी को फांसी की सजा दी।
Navbharat Editorial: Historic verdict by the special court; swift investigation and a robust charge sheet; convict sentenced to death within 59 days.
नरसापुर, फांसी की सजा,(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
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Narsapur Rape Murder Verdict: केवल 59 दिनों के भीतर तत्परता से ऐतिहासिक निर्णय देकर विशेष अदालत ने नरसापुर के नरपिशाच भीमराव कांबले को फांसी की सजा सुनाई है। इसमें पुलिस की तेजी से की गई जांच और 15 दिनों में पेश मजबूत चार्जशीट का भी योगदान है। महाराष्ट्र दिवस को हुई इस अमानुषिक घटना ने समूचे राज्य को स्तब्ध कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के 12 फैसलों की मिसाल देते हुए यह दुर्लभ से भी दुर्लभ मामला अदालत में रखा गया था। राक्षसी अभियुक्त प्रवृत्ति का है। जब वह 36 वर्ष का था तब उसने एक वृद्ध महिला को जबरन अपनी हवस का शिकार बनाया था।

53 वर्ष की उम्र में उसने अपनी 17 वर्षीय भतीजी से दुष्कर्म किया था। ऐसे नराधम को काफी पहले ही कड़ी सजा दी जानी चाहिए थी। साढ़े 3 वर्ष की बच्ची से दुष्कर्म व हत्या करने वाले इस दुष्ट को जीने का कोई अधिकार नहीं है। 65 वर्ष की उम्र में भी वह अत्यंत विकृत है, जिसके सुधरने की 1 प्रतिशत भी संभावना नहीं है।

निर्दयी अपराध पर फांसी की सजा, अब हाई कोर्ट की पुष्टि का इंतजार

न्यायाधीश एस. आर. सालुंखे ने कहा कि यह ठंडे दिमाग से किया गया अमानुषिक अपराध है जो मानवता को कालिख लगाने वाला व अत्यंत निर्दयी है। कानून पर लोगों का विश्वास कायम रखने के लिए इसे फांसी देना उचित है।

मृत्युदंड की हाई कोर्ट से पुष्टि की जाती है। यह मामला ठोस व अकाट्य सबूतों, गवाहों के बयान व कानून की कसौटी पर पूरी तरह सिद्ध हो चुका है इसलिए हाई कोर्ट से उम्मीद है कि वह यथाशीघ्र सजा कन्फर्म करे और इस दरिंदे को फांसी पर लटकाया जाए।

देश में पॉक्सो जैसा कड़ा कानून होने के बावजूद दोषी पाए गए अनेक नराधमों को अब तक सजा नहीं दी गई। ऐसे हजारों मामले देश में बकाया है। दिल्ली के निर्भया प्रकरण में दिल्ली के फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सितंबर 2013 में चारों अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई थी।

दोषियों को शीघ्र सजा मिले, न्याय में अनावश्यक देरी पर उठे सवाल

बाद में मार्च 2014 में दिल्ली हाई कोर्ट ने और मई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने यह सजा कायम रखी। सारे कानूनी विकल्प समाप्त होने के बाद 20 मार्च 2020 को नराधमों को फांसी पर लटकाया गया। उनके एक साथी ने तो जेल में ही आत्महत्या कर ली थी। इस मामले में सजा पर अमल करने में 7-8 वर्ष लग गए, ऐसा नरसापुर मामले में हरगिज नहीं होना चाहिए। देखा गया है कि हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और फिर राष्ट्रपति से क्षमादान की मांग तक मामले लटकते रहते हैं।

ऐसी लंबी प्रक्रिया लोगों का भरोसा तोड़ देती है। विलंब से किया जाने वाला न्याय वास्तव में न्याय नहीं होता। जितनी तत्परता से विशेष अदालत ने अपना काम किया, वैसी ही प्रक्रिया आगे भी जारी रखकर अपराधी को शीघ्रातिशीघ्र यमलोक भेजा जाए।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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