नवभारत संपादकीय: मानसून नहीं आया, लेकिन सियासी मानसून शुरू; सदन में उठेंगे बड़े सवाल

Monsoon Session Maharashtra: महाराष्ट्र विधानसभा का मानसून सत्र शुरू हो गया है। बारिश में देरी, जल संकट, किसानों की समस्याएं, कर्जमाफी व कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
Navbharat Editorial: The monsoon hasn't arrived, but the political monsoon has begun; major questions will be raised in the House.
मानसून सत्र, जल संकट, किसान, (सोर्स: नवभारत फाइल फोटो)
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Maharashtra Drought And Water Crisis: मानसून नहीं आया, लेकिन महाराष्ट्र विधानमंडल का मानसून सत्र शुरू हो गया। अवश्य ही इसमें वर्षा में विलंब से कृषि को हो रहे नुकसान, सूखा स्थिति तथा पेयजल के गंभीर संकट पर चर्चा होगी। 'अल नीनो' की वजह से इस बार वर्षा काफी कम होने का अनुमान मौसम विभाग ने व्यक्त किया है। आशा है कि इन सभी बातों पर मुख्यमंत्री विधानमंडल में सरकार की भूमिका रखेंगे।

क्योंकि यह मुद्दा जनजीवन से जुड़ा है। जलसंकट पर चर्चा की बजाय सरकार किसानों की कर्जमाफी का श्रेय लेना चाहेगी, क्योंकि विधानपरिषद चुनाव की आचारसंहिता की वजह से तब सरकार कर्जमाफी की अधिकृत घोषणा नहीं कर पाई थी। विपक्ष भी कर्जमाफी की जटिल शर्तों का मुद्दा उठा सकता है।

ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा की उम्मीद, लेकिन समय की कमी बड़ी चुनौती

राज्य में कानून-व्यवस्था का प्रश्न, पिंपरी-चिंचवड में विषैली शराब से हुई मौत के मुद्दे भी उठ सकते हैं। हर विधानमंडल सत्र के समय यह उम्मीद रहती है कि जनहित से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा होगी तथा सरकार की ओर से समाधानकारक उत्तर मिलेगा, लेकिन ऐसा होता नहीं। विधानसभा में एकदम 20-25 ध्यानाकर्षण सूचनाएं आती हैं। सदन का कामकाज 24 घंटे चले तो भी इतनी सूचनाओं पर चर्चा नहीं हो सकती, फिर भी इन्हें पेश किया जाता है। इसकी वजह से सदन में महत्वपूर्ण प्रश्नों पर चर्चा के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध नहीं हो पाता। महायुति के पास 240 सदस्यों का प्रचंड बहुमत है।

विधानमंडल में विदर्भ- मराठवाड़ा के ज्वलंत मुद्दों को प्राथमिकता देने की जरूरत

विपक्ष की आवाज तो दब जाती है, सत्ता पक्ष के घटक दलों की ओर से ही ज्यादा हंगामा होता देखा गया है। विधानमंडल के कामकाज में शून्यकाल, ध्यानाकर्षण, कामकाज को लेकर प्रश्नोत्तर, कार्य स्थगन प्रस्ताव आदि का प्रावधान रहता है। इसके अनुसार कार्यवाही संचालन की अपेक्षा की जाती है।

सत्र चाहे नागपुर में हो या मुंबई में, विदर्भ और मराठवाडा के ज्वलंत प्रश्नों पर चर्चा अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि यह इलाके पश्चिम महाराष्ट्र की तुलना में काफी पिछड़े व सुविधाओं से वंचित हैं। कृषि, सिंचाई उद्योग, शिक्षा, रोजगार जैसे क्षेत्रों में विदर्भ का बैकलाग हमेशा से चिंता का विषय रहा है। महाराष्ट्र में विकास के संतुलन की आवश्यकता है।

पुणे-बारामती जैसा न्याय विदर्भ व मराठवाडा को भी मिलना चाहिए। नागपुर में मिनी मंत्रालय की मांग काफी पुरानी है। कपास व धान उत्पादकों की मांगों पर भी गौर किया जाना चाहिए। वास्तव में विदर्भ के जनप्रतिनिधियों को एकजुट होकर इस क्षेत्र के विकास के लिए अधिक निधि का प्रावधान करवाना चाहिए।

विदर्भ में नदियां हैं, लेकिन पर्याप्त सिंचाई व्यवस्था नहीं है। यदि विधानमंडल के पुराने दिनों को याद किया जाए, तो पहले दि. बा. पाटिल, राम कापसे, गणपतराव देशमुख, केशवराव धोंडगे, कृष्णराव धुलप, दत्ता पाटिल, प्रमोद नवलकर, नारायण राणे, दिलीप सोपल, अभ्यासपूर्ण चर्चा करते थे, अब वैसा माहौल नजर नहीं आता।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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