नवभारत संपादकीय: बाल विवाह पर सख्ती से रोक लगाना जरूरी, महाराष्ट्र में बहस तेज

Maharashtra Child Marriage: अक्षय तृतीया पर 32 बाल विवाह रोकने के दावे के बीच महाराष्ट्र में बाल विवाह की कुप्रथा और सोलापुर के मामलों ने कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
Navbharat Editorial: Strict Ban on Child Marriage Essential; Debate Intensifies in Maharashtra
महाराष्ट्र बाल विवाह रोकथाम,(प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स: सोशल मीडिया)
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Child Marriage Prevention Cases: महाराष्ट्र की महिला व बाल विकास मंत्री अदिती तटकरे ने दावा किया कि अक्षय तृतीया को 32 बाल विवाह रोकने में उनके विभाग को सफलता मिली तथा बाल विवाह पर अंकुश लगाने में महाराष्ट्र देश का पहले नंबर का राज्य है। यद्यपि बाल विवाह प्रतिबंधक कानून मौजूद है लेकिन देश में उसका उल्लंघन होता रहता है। राजस्थान में आज भी सर्वाधिक बाल विवाह होते हैं और ऐसे आयोजनों में राजनेता भी शामिल होते देखे गए हैं।

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के मंगलवेढ़ा गांव में 14 वर्ष की बालिका का विवाह होने के कुछ माह बाद उसने आत्महत्या कर ली। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में चल रही इस कुप्रथा का मुद्दा चर्चा में आया। जिन बच्चों की विवाह के लिए शारीरिक-मानसिक तैयारी नहीं होती, उनकी शादी करने के लिए पालक तथा इसके लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन देनेवाले लोग जवाबदार होते हैं।

सोलापुर जिले में ऐसे दर्जनों मामले सामने आए अल्पवयीन बालिकाएं बाल विवाह की वजह से गर्भवती हुई और सरकारी अस्पताल में उनके उपचार की जानकारी भी छुपाई गई। इसमें सोलापुर महापालिका के कुछ स्वास्थ्य केंद्र, सरकारी व निजी अस्पताल में अल्पवयीन लड़कियों की प्रसूति का मामला छुपाया गया। यह प्रकरण सामने आने पर उस अल्पवयीन लड़की के पालक, पति व सास-ससुर सहित 18 लोगों पर मामला दाखिल किया गया।

अब इन बालमाताओं की जानकारी एक स्वयंसेवी संस्था की शिकायत से सामने आई। बाल अधिकार आयोग इसकी जांच कर रहा है। इससे बाल विवाह रोकने में अव्वल होने के महाराष्ट्र के दावे को आघात पहुंचा है। बाल विवाह अल्पवयीन बालिका के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को खतरे में डालता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रमुख कारण गरीबी व अज्ञान है। रोजगार के लिए परिवार यहां से वहां भटकते हैं तथा लड़की की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है कि काम पर जाएंगे तो लड़की की देखभाल कौन करेगा? परिवार का बोझ कम करने के उद्देश्य से कैसा भी वर मिले, लड़की की मजर्जी पूछे बिना उसका विवाह कर दिया जाता है।

इस तरह कानून को ताक पर रखकर बाल विवाह कर दिए जाते हैं। एक बड़ी चुनौती है कि इस कुप्रथा पर कैसे रोक लगाई जाए। इस क्षेत्र में काम करनेवाले व्यक्ति व संस्था मानते है कि यह समस्या काफी बड़ी और देशव्यापी है। अब राज्य में बाल आयोग को पूरी क्षमता से कम करने के लिए आवश्यक अधिकार व बल मिलना चाहिए, गांव, तहसील व जिला स्तर पर बाल संरक्षण समितियों को कार्रवाई करने का अधिकार रहता है।

वह पुलिस की मदद लेकर बाल विवाह रोक सकती हैं। बाल विवाह अल्पायु में मातृत्व का बोझ लादकर बचपन छीन लेता है तथा स्वास्थ्य, शिक्षा आदि के अधिकारों से वंचित कर देता है। बाल विवाह प्रतिबंधक कानून सिर्फ कागज पर नहीं रहना चाहिए। उस पर सख्ती से अमल किया जाना आवश्यक है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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