नवभारत विशेष: जाति जनगणना के पीछे वोटों की राजनीति, नारायण मूर्ति नहीं बताएंगे जाति

Navabharat Nishanebaaz: इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति और उनकी विदुषी पत्नी सुधा मूर्ति ने साफ शब्दों में कहा है वह कर्नाटक सरकार द्वारा कराई जा रही जाति जनगणना में शामिल नहीं होंगे।
नारायण मूर्ति नहीं बताएंगे जाति
नारायण मूर्ति नहीं बताएंगे जाति (सौ. डिजाइन फोटो)
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नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति और उनकी विदुषी पत्नी सुधा मूर्ति ने साफ शब्दों में कहा है वह कर्नाटक सरकार द्वारा कराई जा रही जाति जनगणना में शामिल नहीं होंगे। वह अपनी जाति नहीं बताएंगे। इस तरह के असहयोग से नाराज होकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने पूछा कि क्या केंद्र सरकार द्वारा कराई जानेवाली जाति जनगणना को लेकर भी मूर्ति दंपति ऐसा ही रुख अपनाएंगे?'

हमने कहा, 'किसी व्यक्ति को जाति बताने के लिए क्यों बाध्य किया जाए? 'इंसानियत ' ही हमारी जाति है ! जाति प्रथा देश के लिए कलंक है। महात्मा गांधी ने भी जाति प्रथा और छुआछुत का विरोध किया था। उनका कहना था कि सभी इंसान एक बराबर हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी जाति तोड़ो आंदोलन चलाया व्था और लोगों से कहा था कि जाति की पहचान करानेवाला अपना सरनेम लिखना छोड़ दें। बिहार में इसका असर पड़ा UNESH और बहुत से लोगों ने ऐसा नाम रखा जिससे जाति का पता ही नहीं चलता था।'

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज लोकतंत्र के लिए चुनाव जरूरी हैं और देश के विभिन्न राज्यों में चुनाव जाति के आधार पर लड़े जाते हैं। महाराष्ट्र में कुणबी, मराठा, माली, ओबीसी जैसे वर्ग हैं। बिहार में भूमिहार, कायस्थ, यादव, दलित, महादलित जैसे वर्ग हैं। यूपी में ब्राह्मण ठाकुर, बनिया, यादव के अलावा मायावती समर्थक पिछड़ा वर्ग है। जाति के आधार पर वोटों की ताकत पहचानी जाती है। समाजवाद का लोगों ने यह अर्थ निकाला था कि अपने-अपने समाज को बढ़ाओ। अनुसूचित जाति व जनजाति को कानूनी तौर पर आरक्षण दिया गया है। इसलिए भारत में जाति प्रथा कभी पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाएगी।'

हमने कहा, 'अब अंतर्जातीय विवाह बढ़ने लगे हैं। इससे जातिवाद दूर होने लगेगा। भगवान कृष्ण ने श्रम विभाजन के लिहाज से गीता में चातुर्वर्ण बताए थे लेकिन बाद में लोगों ने इसे जाति का रूप दे दिया। विदेश में कहीं भी जाति प्रथा नहीं है। हम तो यही कहेंगे- जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरी का होई!'

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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