

पिछले छह महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 7% गिरकर 94.95 पर पहुंच गया।
रुपये की गिरावट से कच्चा तेल, सोना, विदेश यात्रा और पढ़ाई महंगी हुई।
सरकार और आरबीआई ने डॉलर बचाने तथा रुपये को संभालने के कई उपाय किए।
विदेशी मुद्रा भंडार में 66 अरब डॉलर की कमी के बावजूद गिरावट रोकना चुनौती बना हुआ है।
Indian Rupee Dollar Rate: पिछले 6 महीने में रुपये का तेजी से अवमूल्यन हुआ पि है। इस दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया 7 प्रतिशत गिरकर 88।84 से 94।95 पर आ गया। इस वजह से आयात महंगा हो गया। गत वर्ष कच्चे तेल का बैरल 8,884 रुपये का था, जो अब 9,495 रुपये का हो गया है। यही हालत सोने की है। विदेश यात्रा और वहां शिक्षा ग्रहण करना काफी महंगा हो गया। डॉलर की बचत करने और रुपये को गिरने से बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने ईंधन का उपयोग कम करने, तेल कम इस्तेमाल करने, सोना नहीं खरीदने तथा विदेश यात्रा टालने को कहा।
भारतीय रिजर्व बैंक ने भी रुपये की गिरावट रोकने के लिए विदेशी मुद्राकोष से डॉलर बेचे। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार विदेशी मुद्रा भंडार 7 सप्ताह में 66 अरब डॉलर घट गया। बॉन को विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक बनाया। इतनी उठापटक के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ा। रिजर्व बैंक ने डॉलर की निकासी रोकने के प्रयास जारी रखे हैं। विदेश में प्रॉपर्टी या शेयर्स खरीदने के लिए रकम भेजने पर पाबंदी लगाई गई है।
इलाज या शिक्षा के उद्देश्य से विदेश भेजे जाने वाली रकम भी 2,50,000 डॉलर वार्षिक से घटाकर सिर्फ 50,000 डॉलर की जा सकती है। वास्तविकता यह है कि इस समस्या का कोई आसान समाधान नहीं है। विदेशी निवेशकों को अपने देश में अच्छी रिटर्न मिल रही है इसलिए वह भारत में निवेश के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। रिजर्व बैंक अपने अधिकारों के तहत डॉलर की विदेश निकासी को नियंत्रित कर रहा है।
इस दौरान यह भी कहा जा रहा है कि रिजर्व बैंक इतने अधिक डॉलर विदेशी मुद्राकोष में क्यों आरक्षित कर रहा है? यह भी कहा जा रहा है कि गिरते रुपये में हस्तक्षेप कर उसे अपना स्तर स्वयं तय करने देना चाहिए, रुपये को और ज्यादा गिरने से बचाने के उद्देश्य से रिजर्व बैंक ने जून से अक्टूबर के बीच 75 से 80 अरब डॉलर बेचे। सितंबर के अंत तक देश के विदेशी मुद्रा भंडार में 720 अरब डॉलर थे।
अमेरिका की एआई कंपनियां लार्ज लैंग्वेज मॉडेल (एलएलएम) बनाने के लिए भारत से बड़ी मात्रा में डॉलर मंगवा रही हैं। रुपये की गिरावट की वजह से विदेशी निवेशक अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश कर रहे हैं। यह बात अलग है कि 10 वर्ष की अवधि के अमेरिकी चॉ पर लगभग 5 प्रतिशत ब्याज दिया जाता है जबकि भारत सरकार के बॉन्ड पर 7.5 प्रतिशत ब्याज देने का वादा है। भूमंडलीय स्थितियों में मुद्रा प्रवाह को नियंत्रित कर पाना काफी कठिन है। उद्योगपतियों के अपने स्रोत व संसाधन हैं।
वह यहां रुपया जमा कर विदेश में वहां की मुद्रा आसानी से हासिल कर सकते हैं। जिन लोगों के बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं वह अब कम डॉलर भेज पाएंगे, इसलिए उन्हें विदेश में पढ़ाई के साथ कुछ कमाई करने की भी जरूरत पड़ेगी। रूस-यूक्रेन युद्ध तथा पश्चिम एशिया संघर्ष का भी रुपये के मूल्य पर प्रभाव पड़ा है। चीन भी रेयर अर्थ, सोलर पैनल तथा ई वाहन की बैटरियों के मामले में आगे है। इनका आयात भी भारत को करना पड़ता है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा