नवभारत संपादकीय: सोच में बदलाव से ही बेरोजगारी का निदान, आखिर क्यों कुर्सी-मेज की नौकरी ही ढूंढ रहे युवा?

Unemployment In India: अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की नई रिपोर्ट ने भारत की बेरोजगारी पर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। जानिए क्यों भारतीय युवा शारीरिक श्रम के बजाय बेरोजगार रहना पसंद कर रहे हैं।
nemployment Crisis in India The Azim Premji University Report and the 'White-Collar Job' Mentality
प्रतीकात्मक तस्वीर (डिजाइन फाेटो)
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Mindset Of Indian Youth: भारत में कामकाज की स्थिति को लेकर अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ताजा रिपोर्ट में समझाया गया है कि देश अपनी बेरोजगारी की समस्या को हल क्यों नहीं कर पा रहा है। ढांचागत चुनौतियों के अलावा रिपोर्ट में समाज की सोच में बदलाव पर जोर दिया गया है। लोग गरिमापूर्ण तथा सफेदपोश काम करना चाहते हैं। युवक बेरोजगार रह जाएंगे लेकिन शारीरिक परिश्रम का काम नहीं करेंगे। उन्हें यह काम छोटा और अपने स्तर के अनुरूप नहीं लगता। सवर्ण व्यक्ति साफसफाई का काम नहीं करना चाहता। उसे कुर्सी-टेबल वाला काम चाहिए, जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था तथा विदेशी शासन के समय से चली आ रही परंपराओं में वह जकड़ा हुआ है।

वास्तव में यह कोई नई खोज नहीं कही जा सकती क्योंकि समाज व्यवस्था में इस तरह छोटे काम और बड़े काम की सोच पहले से चली आ रही है। पश्चिमी राष्ट्रों में ऐसा कुछ भी नहीं है। वहां सफाई कर्मचारी भी सेनेटरी इंजीनियर कहलाता है। वहां कॉलेज का प्रोफेसर भी अपना पेशा बदलकर स्टोर का काउंटर संभालने या रेस्टोरेंट में हेल्पर का काम करने लगता है।

मेहनत से कतराते है युवा

भारत में डिग्री धारी युवा मेहनत का काम करने से कतराते हैं। 2023 में 20 से 29 वर्ष तक की आयु के केवल 6.7 प्रतिशत युवाओं के पास स्थायी वेतन वाली नौकरियां थीं। लगभग 40 प्रतिशत युवा बेरोजगार थे। आधे से भी कम युवा अर्धबेरोजगार थे या बेहतर अवसर की खोज में थे। स्नातकों या उससे भी ज्यादा शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी की समस्या आज भी काफी गंभीर है। जिस उम्र में वह मेहनत कर सकते हैं, बेरोजगारी के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं। कुछ लोग अपनी योग्यता के अनुसार या अभिरुचि का काम नहीं मिलने से नौकरी नहीं करते। स्वयंरोजगार भी बहुत कम युवा कर पाते हैं। देश की 15 से 29 वर्ष आयु के लोगों की आबादी 36 करोड़ से ज्यादा है। स्कूल व कॉलेज में पढ़ने वाले छोड़ दिए जाएं तो कार्यक्षम युवाओं की आबादी 26 करोड़ के आसपास है।

रिपोर्ट के अनुसार आगे आने वाले वर्षों में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। युवाओं को समझना होगा कि कौशलयुक्त शारीरिक काम किसी भी तरह से हीन नहीं है। एक मकान बनाने वाला मिस्त्री, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन भी डिग्रीधारियों से ज्यादा कमा लेता है। इसे जाति या वर्ग से जोड़ना उचित नहीं है, यह धारणा दूर होनी चाहिए कि सफेदपोश दिमागी काम ऊंचा है और शारीरिक मेहनत का काम नीचे दर्जे का है। यदि ऐसा पूर्वाग्रह दूर हो जाए तो युवाओं को अधिक संख्या में काम मिल सकता है। इसके साथ ही तकनीकी तथा वोकेशनल ट्रेनिंग का विस्तार करना होगा। साथ ही सोच में बदलाव जरूरी है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा

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