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नवभारत विशेष: रूस व ईरान से ऊर्जा सहयोग समझौता जरूरी, भारत अपने हित में निर्णय ले
- Written By: अंकिता पटेल
India Oil Supply: तेल-गैस आपूर्ति, होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक तनाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। आयात निर्भरता और आपूर्ति संकट पर बहस तेज है।

तेल संकट, (सोर्स: सोशल मीडिया)
India Oil Import Crisis: इस युद्ध के कारण हम सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत तेल, गैस और खाद आयात करता है और होमुंज स्ट्रेट के बंद होने के कारण हमारी 50 फीसदी से ज्यादा सप्लाई रुक गई है। भारत एक साल पहले तक रूस से अपनी कुल तेल जरूरतों का करीब 44 फीसदी आयात करता था, लेकिन अब अमेरिका के दबाव के कारण हमारा आयात घटकर 20 फीसदी के आसपास पहुंच गया है और हालांकि सरकार कह रही है 67 दिनों का रिजर्व हमारे पास है, लेकिन जिस तरह से गैस की किल्लत है और तेल की खपत कम करने के लिए प्रधानमंत्री ने खुद आह्वान किया है, उससे साफ है कि संकट जितना दिख रहा है, उससे कहीं गहरा है।
ब्रिक्स समूह में इस समय ब्राजील, रूस, ईरान और दक्षिण अफ्रीका, भारत की तरफ ही निर्णायक फैसले के लिए देख रहे हैं। अगर भारत कोई निर्णायक कदम नहीं उठाता तो हमारी ऊर्जा जरूरतें जबर्दस्त बंग से प्रभावित होंगी। पहले ही हम दो महीनों में दुनिया की चौथी से छठवीं अर्थव्यवस्था बन चुके हैं।
अगर और देरी की तो एक डॉलर 100 रुपये के पार चल जायेगा। अगर रूस और ईरान दोनों इशारा कर रहे हैं, तो भारत को इनके साथ ऊर्जा सहयोग का दीर्घकालिक समझौता कर ही लेना चाहिए, अगर हम इस उम्मीद में बैठे रहे कि अमेरिका हमारी मदद करेगा और हमारी अर्थव्यवस्था को कमजोर नहीं पड़ने देगा तो हमारी भूल होगी। अमेरिका-भारत से यह तो कह रहा है कि हमसे चाहे जितना तेल चाहो ले लो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक तो अमेरिकी तेल भारत तक आते आते 15 से 16 फीसदी महंगा हो जाता है और फिर जिस
दर पर हमें रूस और ईरान तेल देने के लिए तैयार है, अमेरिका उस दर पर कभी नहीं देगा।
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इससे भी बड़ी बात यह है कि हम जरा सी कोशिश से रूप्स और ईरान दोनों से रुपये में तेल ले सकते हैं, जिससे बड़ी मात्रा में हमारी विदेशी मुद्रा बचेगी। हम चाहें तो रूस रुपये में तेल देने से पूरी तरह से मना नहीं करेगा और अगर हम आधा तेल भी रुपये में ले पाते हैं तो हमारी विदेशी मुद्रा जो दिन दूनी, रात चौगुनी रफ्तार से घट रही है, उस पर रोक लगेगी। भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। हमारी डिजिटल क्षमता, विशाल बाजार, रणनीतिक स्थिति और लोकतांत्रिक व्यवस्था, हमारे पास एसेट की तरह हमारी यूएसपी हैं।
ऐसे में हमें अपनी गिरती हुई सेहत के लिए किसी और की तरफ क्यों देखें? क्यों उम्मीद करें कि कोई आकर हमें संभालेगा? भारत एक ताकत है और हमें अपनी ताकत का प्रदर्शन अपने अस्तित्व के लिए तो करना ही चाहिए। अगर हम अमेरिका के भरोसे बैठे रहे, तो गच्चा खा जाएंगे, ऐसे में हमें अनिर्णय को स्थिति में नहीं रहना चाहिए, जब हम कहते हैं कि हमारी रणनीति हमारे अपने हितों के मद्देनजर तय होगी, तो हमें अपने ऊर्जा संकट को हल करने के लिए उपलब्ध विकल्पों को क्यों नहीं स्वीकार करना चाहिए? अभी पिछले पखवाड़े रूस के एलपीजी से भरे एक जहाज को भारत ने बिना खरीदे वापस कर दिया। जाहिर है यह सब अमेरिका के दबाव के कारण हुआ, भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को स्पष्ट रूप से सामने लाना होगा। तटस्थ रहने से हमारे हित प्रभावित हो रहे हैं।
भारत अपने हित में निर्णय ले
दिल्ली में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक चल रही है। हालांकि चीन इसमें भाग नहीं ले रहा, लेकिन रूस, ईरान और बाकी देशों की उपस्थिति के बीच रूसी विदेश मंत्री लावरोव और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दुनिया के मौजूदा संकट के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया है।
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ईरानी विदेश मंत्री ने तो साफ-साफ शब्दों में कहा है कि ब्रिक्स देशों को अमेरिका और इजराइल की आलोचना करना चाहिए, होर्मुज संकट के कारण दुनिया के 50 से ज्यादा देशों की अर्थव्यवस्थाएं संकट से घिर गई हैं और भारत में एनर्जी इमरजेंसी के हालात पैदा हो रहे हैं।
लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा
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