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नवभारत विशेष: महिलाओं का अपने शरीर पर अधिकार हो, प्रजनन स्वायत्तता को कानूनी मान्यता मिले
- Written By: अंकिता पटेल
India MTP Act: भारत में गर्भपात को महिला अधिकार के बजाय सशर्त कानूनी अनुमति के रूप में देखा जाता है। एमटीपी कानून, मेडिकल राय और अनुच्छेद 21 को लेकर बहस तेज है।

गर्भपात कानून,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Abortion Rights in India: गर्भपात को महिलाओं के अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी गई है बल्कि इसकी अनुमति सशर्त वैधानिक आधारों और मेडिकल राय के अनुसार दी जाती है। नतीजतन कानून के भीतर मेडिकल पितृसत्तात्मकता प्रवेश कर जाती है, जहां डॉक्टर क्लिनिकल सलाहकार के साथ ही कानूनी चौकीदार भी बन जाता है। यह व्यवस्था अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या के अनुरूप प्रतीत नहीं होती बल्कि उसे कमजोर भी कर देती है। दरअसल, एमटीपी कानून की अनिश्चित ड्रॉफ्टिंग ने वैचारिक कमजोरी को अतिरिक्त दुर्बल कर दिया है। भारत का कानून 1967 के ब्रिटिश एबॉर्शन एक्ट पर आधारित है।
भारत की संसद ने अपने कानून में ‘एबॉर्शन’ शब्द की जगह ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी’ (एमटीपी) शब्दों के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी और इन्हें इस तरह से परिभाषित किया कि मेडिकल या सर्जिकल तरीकों का प्रयोग करते हुए गर्भधारण को समाप्त करना, अतः एमटीपी की परिभाषा में सीजेरियन सेक्शन से व्यथित शिशु को बचाना, मृत भ्रूण को हटाना या अस्थानिक गर्भावस्था (नलियों में बच्चा ठहरना) की सर्जरी तकनीकी दृष्टि से शामिल हो जाते हैं।
लेकिन जब बहुभ्रूण गर्भधारण में भ्रूणों की संख्या कम करने के लिए भ्रूण हत्या की जाती है, तो वह एमटीपी नहीं है। एमटीपी कानून की सबसे बड़ी बाधा यौन हमलों की बाल पीड़िताओं के मामले में उभरकर सामने आई है। इस सबसे कमजोर समूह में कानूनन एमटीपी 24 सप्ताह तक ही कराई जा सकती है, जब तक कि महिला के जीवन को त्वरित खतरा न हो। लेकिन 15 साल की बच्ची, जिसे 26वें सप्ताह में अपनी गर्भावस्था के बारे में मालूम होता है, वह तो त्वरित मौत का सामना नहीं कर रही होती।
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वह अलग किस्म की भयावह स्थिति का सामना कर रही होती है- एक शरीर जो गर्भावस्था के लिए तैयार नहीं है, एक मन जो मातृत्व के लिए तैयार नहीं है और एक कानून जो उसे मजबूर करता है कि वह अपनी गर्भावस्था मुकम्मल करे। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़ित एक नाबालिग लड़को को 30 सप्ताह पर एमटीपी की अनुमति दी, जबकि कोई भ्रूण विसंगति नहीं थी। महिला को वैवाहिक स्थिति तय करती है कि वह 20 और 24 सप्ताह के बीच कानूनन गर्भपात करा सकती है या नहीं।
अगर महिला की वैवाहिक स्थिति बदल गई है (यानी वह विधवा या तलाकशुदा हो गई है) तो वह एमटीपी करा सकती है। एकल महिलाएं व जो लिव-इन रिलेशनशिप में हैं, उनके लिए यह छूट नहीं है। यह न केवल दकियानूसीपन है बल्कि असंवैधानिक भी है। एमटीपी एक्ट के सेक्शन 3(2) की व्याख्या 1 में 2021 के संशोधन के जरिए संसद ने ‘पति’ शब्द को हटाकर उसकी जगह ‘पार्टनर’ शब्द रखा।
इस संशोधन के आधार पर सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि गर्भपात अधिकारों के दायरे में अविवाहित महिलाओं व सिंगल महिलाओं को भी लाने का मकसद है। इस फैसले के बावजूद नियमों को अभी तक बदला नहीं गया है। संशोधित एमटीपी कानून ने ‘मेडिकल बोर्ड की भी रचना की, जिसमें एक गायनेकोलोजिस्ट और अनेक गैर-गायनेकोलोजिस्ट विशेषज्ञ रखे जाते हैं। यह बोर्ड अनुमति देता है कि 24 सप्ताह के बाद गर्भपात कराया जा सकता है या नहीं। गोपनीयता का प्रावधान भी बेकार का प्रतीत होता है। नियमों के मुताबिक एमटीपी रोगी की पहचान नाम की बजाय नंबर से की जाती है।
प्रजनन स्वायत्तता को कानूनी मान्यता मिले
दशकों की बेचैन खामोशी के बाद केंद्र सरकार ने 2021 में एमटीपी (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी) एक्ट-1971 में संशोधन किया था। हालांकि संशोधित कानून में जो जबरदस्त खालीपन था, उसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने 21 जुलाई 2022 के एक महत्वपूर्ण निर्णय के माध्यम से भरने का प्रयास किया।
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अब अविवाहित महिला को भी 20-24 सप्ताह के अनचाहे भ्रूण को गिराने की अनुमति होगी बशर्ते कि मेडिकल विशेषज्ञ सुरक्षा को सर्टिफाई कर दें। संशोधित एमटीपी कानून ने गर्भपात को मनमर्जी की प्रक्रिया बनाकर रख दिया है, जिसमें हर किसी का दखल है, सिवाय संबंधित महिला के।
लेख- डॉ. अनिता राठौर के द्वारा
India abortion law mtp act womens rights article 21 debate
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