नवभारत संपादकीय: गड़चिरोली आश्रमशाला में लापरवाही का आरोप, जमीन पर सो रहीं 6 छात्राओं को सांप ने डसा

Gadchiroli Hostel Snakebite: गड़चिरोली के धानोरा स्थित आश्रमशाला में पलंग नहीं होने से जमीन पर सो रहीं 6 छात्राओं को जहरीले सांप ने डस लिया। इनमें 3 छात्राओं की मौत हो गई।
Navbharat Editorial: Allegations of negligence at Gadchiroli ashram school
गड़चिरोली आश्रमशाला में लापरवाही का आरोपफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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Gadchiroli Tribal Girls Snakebite: इस देश की असंवेदनशील व्यवस्था में गरीबों की जान 5 की कोई कीमत ही नहीं है। आजादी के 79 वर्ष बाद भी आदिवासी समुदाय उपेक्षित है। उसके नसीब में निर्धनता, बीमारी, कुपोषण, बाल मृत्यु, अशिक्षा जैसी समस्याएं तो पहले से लिखी हैं। बरसात के मौसम में सांप-बिच्छुओं का भी खतरा बढ़ जाता है।

गड़चिरोली जिले की धानोरा तहसील के जपतलाई में अनुदानित प्राथमिक व माध्यमिक आश्रमशाला के छात्रावास में पलंग नहीं होने से जमीन पर सो रहीं 6 छात्राओं को जहरीले सांप ने डस लिया। लिया। इन 8 से 14 वर्ष उम्र की बालिकाओं में से 3 की मृत्यु हो गई और अन्य की हालत चिंताजनक है। आखिर व समाजकल्याण आदिवासी कल्याण की ग्रैंट कहां जाती है? जो छात्राओं को पलंग तक उपलब्ध नहीं कराए गए? जमीन पर सोने की वजह से वह सर्पदंश का शिकार बनीं।

'बेटी बचाओ' नारा कितना असरदार?

क्या बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ सिर्फ सजावटी नारा बनकर रह गया है? उन माता-पिता के दिल पर क्या गुजरी होगी, जिनकी बिटिया प्रशासन की लापरवाही से मौत के मुंह में चली गई! क्या बगैर किसी व्यवस्था के आश्रमशालाएं व उनके छात्रावास चलाए जाते हैं?

एक तरफ तो हम अंतरिक्ष युग में जी रहे हैं, कितनी ही अनुत्पादक व गैरजरूरी योजनाओं पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है, लेकिन हमारे विकास की प्राथमिकता में आदिवासी कहां हैं? कभी मिड डे मील घोटाला, तो कभी चिक्की घोटाला होता है। प्रतिवर्ष मेलघाट, गड़चिरोली, पालघर जैसे जिलों में कुपोषण की वजह से बालमृत्यु की घटनाएं होती हैं।

आदिवासी बेटियों की सुरक्षा पर सवाल

प्रसूति के दौरान महिलाएं जान गंवा बैठती हैं क्योंकि कच्ची उम्र में विवाह हो जाता है और पोषण की कमी की वजह से उनका मातृत्व संकट में पड़ जाता है। क्या समुचित शिक्षा व सामाजिक जागृति से बालविवाह को रोके जाने के प्रयास नहीं हो सकते? डॉ. अभय बंग और डॉ. रानी बंग ने आदिवासी क्षेत्र में बहुत सेवा की है तथा वहां की समस्याओं को उजागर किया है।

इतने पर भी जब तक शासकीय स्तर पर सघन प्रयास नहीं होंगे, इन इलाकों के आदिवासियों का जीवन निरापद नहीं हो सकता। वहां आदिवासी महिला अपने बीमार शिशु को अस्पताल में छोड़कर काम पर चली जाती है। ऐसा न करे तो उसके परिवार को रात का खाना न मिले। आज भी देश के आदिवासी क्षेत्रों में, चाहे वह किसी भी राज्य के हों, जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण है।

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आश्रमशालाओं की बदहाली पर प्रशासन से जवाब तलब

मुद्दा यह है कि क्या आदिवासी कल्याण के लिए पर्याप्त बजट नहीं हैं और यदि है तो इन क्षेत्रों में हितग्राहियों तक सुविधाएं क्यों नहीं पहुंच रही हैं? क्या प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है और बीच में रकम हड़पी जा रही है।

यदि नहीं तो 25 वर्षों से इस आश्रमशाला छात्रावास में पलंग जैसी बुनियादी जरूरत क्यों नहीं पूरी की गई? जब सांप के काटने से बच्चियों की मौत हो गई तो क्या अब भी शासन-प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया रहेगा? मुद्दा यह भी है कि क्या आश्रमशाला व छात्रावास के पदाधिकारियों की लापरवाही इसके पीछे है? उन्होंने क्यों नहीं आवश्यक बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई? यदि फंड की कमी थी तो प्रशासक व जनप्रतिनिधियों का ध्यान आकर्षित कर सकते थे तथा किसी एनजीओ या स्वयंसेवी संस्था की मदद ले सकते थे?

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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