नवभारत संपादकीय: डिजिटल जनगणना में डेटा सुरक्षा की चुनौती, 30 लाख डिवाइस पर हैकर्स की नजर?

Census Data Security: डिजिटल जनगणना में नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। 30 लाख एन्यूमरेटर्स के डिवाइस और बड़े डेटा बेस पर साइबर हमलों का खतरा चिंता बढ़ा रहा है।
Citizens' personal information in the digital census
डिजिटल जनगणना में नागरिकों की निजी जानकारीफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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Digital Census Data Privacy: देश के विकास के लिए योजनाएं बनाने के उद्देश्य से जनगणना के माध्यम से सरकार को जानकारी जुटाना आवश्यक है, लेकिन मुद्दा यह है कि कहीं नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग न हो। विदेशी हैकर्स एआई मॉडेल्स से पिछले कुछ महीनों से डाटा बेस हैक कर रहे हैं। इसके पहले भी भारतीयों का डाटा सुरक्षित नहीं था। 2018 में आधार कार्ड लॉगइन की जानकारी वॉट्सएप पर 500 रुपये में बेची गई थी।

2023 में कोविड डाटा लीक हुआ था। उसी वर्ष 81 करोड़ भारतीयों के व्यक्तिगत विवरण की आईसीएमआर डाटा लीक की पुष्टि हुई थी। अब पूरी तरह डिजिटल जनगणना में जनगणना कर्मियों (एन्यूमरेटर्स) के 30 लाख व्यक्तिगत फोन व टैबलेट हैकर्स के निशाने पर हो सकते हैं। यद्यपि सरकार दावा करती है कि जनगणना के दौरान एकत्रित किया गया सारा डाटा गोपनीय व सुरक्षित रहेगा, लेकिन जब जरूरत से ज्यादा विवरण लिया जाए, तो सुरक्षा व गोपनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

Citizens' personal information in the digital census
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जनगणना में 40 सवाल, बदलती जरूरतों का मिलेगा आंकड़ा

जब ब्रिटिश शासन में पहली बार जनगणना की गई थी, तब 17 प्रश्न पूछे गए थे जबकि इस समय चल रही जनगणना में 40 सवाल पूछे जा रहे हैं। सरकार की दलील हो सकती है कि इस विवरण से निर्धारित किया जा सकेगा कि भविष्य में देश में कितने स्कूल, अस्पताल, विमानतल बनाने हैं। सरकार को बदलती डेमोग्राफी का पता चल सकेगा कि लोगों का शैक्षणिक व आर्थिक स्तर, पारिवारिक ढांचा और उनका आयुर्मान कितना व कैसा है।

यद्यपि जनगणना का विवरण व्यक्तियों से लिया जाता है, लेकिन फिर इसके आधार पर औसत निकाला जाता है। पता चल जाएगा कि 2011 की पिछली जनगणना के 15 वर्ष बाद लोगों की आबादी, आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवनस्तर, औसत आयु व सुविधाओं में कितना बदलाव आया है। साथ ही यह निर्धारित हो सकेगा कि कहां कमी रह गई और कैसी योजनाएं बनाकर सुधार लाया जा सकता है, मिसाल के तौर पर यह पूछा जा सकता है कि लोगों का यातायात का साधन क्या है तो उस अनुपात में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था की जा सकती है। उनके निवास के विवरण से पता चल सकता है कि कितने मकानों की आवश्यकता है।

जनगणना में निजी डेटा लेने पर उठे सवाल, साइबर खतरे की चिंता

अब असली मुद्दा यह है कि जनगणना में लोगों के आधार, फोन नंबर, पासपोर्ट तथा वोटर आईडी की जानकारी क्यों ली जा रही है? इतना पूछना काफी है कि क्या आपके पास पासपोर्ट है लेकिन व्यक्तिगत विवरण को खंगालने की आवश्यकता क्या है? इससे लाभ होने की बजाय नुकसान की संभावना ज्यादा है।

कहीं साइबर फ्रॉड या डिजिटल अरेस्ट करने वालों के हाथ किसी तरह से यह जानकारी पहुंच गई, तो लोगों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। कंपनियों तक जानकारी पहुंची तो वह अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए इसका व्यावसायिक इस्तेमाल करेंगी। नागरिकों का विस्तार से व्यक्तिगत विवरण बुरी ताकतों के पास पहुंच जाना न तो सरकार चाहेगी न देश की जनता।

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