नवभारत संपादकीय: युवा आंदोलन की जीत या सरकार की हार? प्रधान के इस्तीफे पर बड़ा सवाल

Dharmendra Pradhan Resignation: आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को शिक्षा व्यवस्था पर जनदबाव की जीत माना जा रहा है। अब सरकार के सामने परीक्षा प्रणाली में भरोसा बहाल करने की चुनौती है।
dharmendra pradhan resignation gen z protest education reforms editorial
धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Updated on

Student Protest Victory: आखिर सरकार की जिद की हार हुई और जेन जी की जीत हुई। प्रधानमंत्री मोदी व गृहमंत्री अमित शाह इच्छा होने पर भी प्रधान को नहीं बचा पाए। इससे जाहिर हो गया कि सरकार को कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के सामने झुकना पड़ा।

इतने दिनों तक संरक्षण दिया लेकिन फिर दवना ही पड़ा। यदि पहले ही यह इस्तीफा हो जाता तो आंदोलन इतना लंबा नहीं चलता। अब शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था पर पुनः विश्वास स्थापित करने की चुनौती सरकार के सामने रहेगी। इस आंदोलन ने महत्वपूर्ण संदेश दिया कि युवा पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर जागरूक है।

ABVP से शिक्षा मंत्री तक धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर

धर्मेंद्र प्रधान बीजेपी के भरोसेमंद संगठक रहे। वह पार्टी के राजनीतिक प्रबंधक माने जाते रहे। वह ऐसे ओडिशावासी रहे जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपना प्रभाव जमाया। उनके पिता देवेंद्र प्रधान पूर्व पीएम अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री थे। धर्मेंद्र प्रधान ने अपने गृहनगर तालचेर में महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रहण करते हुए अ.भा. विद्यार्थी परिषद में सक्रिय भूमिका निभाई।

1993 में वह विद्यार्थी परिषद के राज्य सचिव तथा 1995 में राष्ट्रीय सचिव बने। 1998 में वह पहली बार विधायक चुने गए। विधायक रहते हुए उन्हें उत्कलमणि गोपबंधु प्रतिभा सम्मान से नवाजा गया। प्रधान को ओड़िशा विधानसभा के श्रेष्ठ विधायक का सम्मान भी प्रदान किया गया। 2021 में उन्हें केंद्र में शिक्षा मंत्री बनाया गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में वह संबलपुर सीट से भारी बहुमत से जीते।

पेपर लीक विवाद में बढ़ा दबाव, धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका पर सवाल

पार्टी और संगठन के प्रति वफादार रहने के बावजूद वह छात्रों के प्रश्नों व समस्याओं को लेकर उदासीन बने रहे, पेपर लीक की बार-बार आती हुई शिकायतों को उन्होंने कभी गंभीरता से नहीं लिया।

उन्होंने जंतर-मंतर पर आंदोलन के बाद भी अड़ियल रवैया अपनाया, छात्रों की प्रमुख मांग को मानते हुए यदि वह पहले ही नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देते तो सोनम वांगुचक का अनशन व युवाओं का आंदोलन पहले ही वापस ले लिया जाता। अब बीजेपी धर्मेंद्र प्रधान का पार्टी संगठन में उपयोग कर सकती है लेकिन जब ओडिशा के ही नितिन नबीन पार्टी अध्यक्ष हैं तो धर्मेंद्र की भूमिका गौण बनी रहेगी।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर विपक्ष ने युवा आंदोलन की जीत बताई

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अभिजीत दीपके ने कहा कि दुनिया झुकती है, झुकानेवाला चाहिए, जो कहते थे कि इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते, वहां आखिर इस्तीफा हो गया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की टिप्पणी है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की दिशा में बहुत बड़ा कदम है।

एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार की राय थी कि दमनकारी रवैये से न डरते हुए अन्याय के खिलाफ दृढ़ता से खड़े होकर सरकार को नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए मजबूर करने वाला यह संघर्ष युवाशक्ति की एकजुटता की बड़ी जीत है।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि आज की पीढ़ी हर बात पर सवाल करती है इसलिए उसे केवल आदेश देने से काम नहीं चलता। आज डिक्टेशन की नहीं, डिस्कशन की जरूरत है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

Navbharat Live
navbharatlive.com