

अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा पर तनाव और सैनिकों के बीच गतिरोध की स्थिति बनी हुई है।
चीन सीमा के पास 628 गांव बसा रहा है, जिनमें कई में सैन्य सुविधाएं भी होने का दावा है।
सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार, चीन सीमा पर सड़कें, पुल और सैन्य शिविरों का विस्तार कर रहा है।
सीमा पर शांति के दावों के बावजूद स्थिति को लेकर चिंता बनी हुई है।
China Border Villages and Military Infrastructure: अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन के सैनिकों के आमने-सामने होने के दावों पर चीन ने साफ किया है कि दोनों देश एक-दूसरे के संपर्क में हैं और समझौतों का सख्ती से पालन हो रहा है। दोनों पक्षों में बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए सहमति बनी है।
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के निवर्तमान महानिदेशक की इस पुष्टि से कि अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कई स्थानों पर भारत और चीनी सैनिकों के बीच गतिरोध और टकराव की स्थिति बनी हुई है, सरकार इनकार कर सकती है। स्थिति शांत दिखती है पर यह एक 'असहज स्थिरता' है।
चीन अरुणाचल प्रदेश से लगी नियंत्रण रेखा के पास तिब्बती इलाके के 628 गांवों में अपने लोगों को जबरिया बसा रहा है, जिनमें से 90 प्रतिशत बस्तियां अरुणाचल प्रदेश की तरफ हैं। इनमें सैकड़ों ऐसे गांव भी बसाए गए हैं जिनका इस्तेमाल 'दोहरे उद्देश्य' के लिए किया जा सकता है यानी इनमें नागरिकों के रहने की जगह के साथ-साथ सैन्य बुनियादी ढांचा भी मौजूद है।
ऐसे में इस तथ्य को नकारना कठिन है कि चीनी सेना अरुणाचल में अतिक्रमण के प्रयास में नहीं है। सैटेलाइट से मिली तस्वीरों में चीन द्वारा सीमा के पास अपने गांवों का तेजी से विस्तार किए जाने की बात को झुठलाना संभव नहीं है। उसने सीमावर्ती क्षेत्र की कई जगहों पर सड़कें, पुल और सैन्य शिविर बनाए हैं।
हमारे लिए मुख्य चिंता चीनी बस्तियों का बढ़ना ही नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उस बहाने बुनियादी ढांचे का विस्तार और आबादी वाले इलाकों में नेटवर्क का निर्माण भी है। भारत सरकार और सेना इस स्थिति के प्रति पूरी तरह सचेत, सावधान ही नहीं बल्कि सक्रिय भी हैं। दोनों देशों के बीच हुए 1962 के एकमात्र युद्ध का अरुणाचल मुख्य केंद्र रहा था। दोनों देशों के बीच संबंध तब से ही तनावपूर्ण बने हुए हैं। 1975 के बाद से अरुणाचल प्रदेश में कुछ छोटी-मोटी झड़पों को छोड़कर, कोई बड़ा टकराव नहीं हुआ है।
यहां तक कि गलवान में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हाथापाई के दौरान भी, अरुणाचल प्रदेश की सीमा शांत रही। भारतीय अधिकारियों ने दशकों तक अरुणाचल प्रदेश में सड़कें बनाने से इसलिए परहेज किया कि इससे हमलावर चीनी सेना को दक्षिण की ओर आने के लिए एक आसान रास्ता मिल जाएगा। मगर बाद में लगा कि खराब कनेक्टिविटी की वजह से अपने सैनिकों तक जरूरी सामान पहुंचाना तो मुश्किल है ही, वहां के नागरिक भी मुख्यधारा से कटे रहे।
इस बीच चीन ने अपनी तरफ सड़कों का एक बड़ा जाल बिछा लिया। अब भारत अरुणाचल के दूरदराज के सीमावर्ती इलाकों के हालात बदल रहा है। सेना सीमा तक पहुंच, सैन्य रसद, सीमावर्ती गांवों का विकास और निगरानी क्षमता की रणनीति पर मजबूती से काम कर रही है। यहां सीमा के सैन्य शिविरों में पहले से ज्यादा सैनिक तैनात हैं। रक्षा मंत्रालय और सड़क निर्माण विभाग इलाके में सैकड़ों किलोमीटर लंबी सड़कें बना चुके हैं, जिनमें 'सेला टनल' भी शामिल है, जिससे सर्दियों के मौसम में भी यहां के सबसे बड़े कस्बे तवांग तक पहुंचना सुगम हुआ है।
अरुणाचल प्रदेश की नदियों में जलविद्युत निर्माण की अपार संभावनाएं देखते हुए सरकार की योजना कई बांध बनाने की है, जिसमें 'अपर सियांग' नदी पर बनने वाला अब तक का सबसे बड़ा बांध भी शामिल है। सरकार ने राज्य की 2,082 परियोजनाओं के लिए लगभग 28 अरब रुपये आवंटित किए, जो राज्य की जीडीपी का 6 फीसद है। योजना में सड़क, बिजली, दूरसंचार, पेयजल, पर्यटन, कौशल विकास और स्थानीय रोजगार जैसे विषय शामिल होने से इस इलाके से लोगों का पलायन रुका और आर्थिक स्थिति सुधरी।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा