राधावल्लभ संप्रदाय में क्यों नहीं रखा जाता एकादशी व्रत? जानें क्यों इस तिथि पर भी प्रसाद पाते हैं रसिक संत

Radhavallabh Sampradaya Ekadashi Fast Ritual: जहां एक ओर भगवान श्रीकृष्ण को एकादशी का व्रत अत्यंत प्रिय है, वहीं राधावल्लभ संप्रदाय के रसिक संत क्यों नहीं करते हैं एकादशी का व्रत। पूरी खबर पढ़ें!
Radhavallabh Sampradaya Ekadashi Fast Ritual News
राधावल्लभ संप्रदाय में क्यों नहीं होता एकादशी का व्रत (सौ. AI Generated Image)
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Radhavallabh Sampradaya Ekadashi Fast Ritual News: भगवान श्रीकृष्ण की उपासना करने वाले भक्त वैष्णव परंपरा से जुड़े नियमों का पालन करते है। वैष्णव परंपरा और पौराणिक हिंदू मान्यता के अनुसार, एकादशी तिथि को होने वाले एकादशी व्रत को सभी 'व्रतों का राजा' माना जाता है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, एकादशी की तिथि पर अन्य का त्याग करने से समस्त जन्मों के पापों का नाथ होता है और भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य कृपा भी प्राप्त होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वृंदावन के राधावल्लभ संप्रदाय में एकादशी के व्रत का कोई प्रावधान नहीं है। इस दिन वृंदावन के राधा वल्लभ संप्रदाय के रसिक संत भी एकादशी उपवास नहीं करते हैं।

राधा वल्लभ संप्रदाय में कैसे होती है उपासना?

राधा वल्लभ संप्रदाय की भक्ति पद्धति 'शास्त्रों' या 'वैधी भक्ति' (नियम-कानून) से नहीं बल्कि शुद्ध रसोपासना (प्रेम भक्ति) पर आधारित होती है। इस संप्रदाय में राधारानी और लालजूं के निकुंज लीलाओं का उपासना की जाती है। जिसमें सहचरी या दासी भाव से उपासना की जाती है। ये कारण है कि राधा वल्लभ संप्रदाय में ना सिर्फ एकादशी बल्कि किसी भी अन्य व्रत का कोई विधान नहीं है।

आखिर क्यों नहीं किया जाता है एकादशी व्रत?

राधा वल्लभ संप्रदाय में अष्टयाम सेवा पद्धति की जाती है। अष्टयाम सेवा विधि में एक दिन में 5 बार श्रीजी अर्थात राधारानी को भोग लगाया जाता है। जिसमें मंगला भोग, धूप भोग, राजभोग, उत्थापन भोग और शयन भोग लगाया जाता है। जिसके बाद इस भोग को भक्त प्रसाद स्वरुप ग्रहण करते हैं।

वृंदावन के रसिक संतों के अनुसार, प्रसाद को केवल अन्न समझना भी एक आध्यात्मिक अपराध माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि कोई पदार्थ एकादशी के दिन अन्न होता है, तो वह द्वादशी के दिन प्रसाद कैसे हो सकता है?

प्रसाद की दिव्यता तिथि और पंचांग के अनुसार तय नहीं होती है। जो लोग एकादशी के दिन प्रसाद को अन्न समझकर उसका त्याग करते है, वे यमराज की नगरी में बांधे जाएंगे। मान्यता के अनुसार, प्रसाद का निरादर करना करोड़ों एकादशी के पुण्यों को नष्ट करने जैसा ही होता है। यही कारण है कि राधा वल्लभ संप्रदाय में एकादशी व्रत का कोई नियम नहीं है।

निष्कर्ष

रसिक संतों द्वारा एकादशी व्रत नहीं करना किसी भी प्रकार के शास्त्रों का अनादर नहीं, बल्कि महा प्रेमरस में उनकी प्रगाढ़ तल्लीनता है। इन रसिक संतों के लिए भक्ति का अर्थ नियमों में बंधना नहीं, बल्कि अपने इष्ट के प्रति अटूट समर्पण और उनके प्रसाद में अमिट विश्वास है।