

Lalita Saptami Kab Hai : ललित सप्तमी का पावन पर्व हर साल राधा अष्टमी एक दिन पहले मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व बताया गया है। क्योंकि, यह पर्व राधा रानी और कान्हा जी की प्रिय सखी श्री ललिता देवी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। ललित सप्तमी पर्व मुख्य रूप से ब्रज क्षेत्र और वैष्णव संप्रदाय में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है।
मान्यता है कि इस दिन रखने और ललिता देवी के साथ राधा-कृष्ण जी की पूजा करने से सुख-समृद्धि और संपन्नता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस साल ललिता सप्तमी कब मनाई जाएगी और पूजा शुभ मुहूर्त, विधि क्या रहेगा। यहां जानिए
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का आरंभ 17 सितंबर को सुबह 10 : 49 मिनट से होकर 18 सितंबर को दोपहर 1: 02 मिनट तक। उदयातिथि के अनुसार, ललिता सप्तमी का पर्व 18 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा।
ललिता सखी को श्री राधारानी की प्रमुख और प्रिय सखियों में से एक माना जाता है। वे राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सखी के रूप में वर्णित हैं।
ललिता सखी को प्रेम, भक्ति, सेवा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। भक्त इस दिन उनके चरणों में श्रद्धा अर्पित करके श्री राधा-कृष्ण की भक्ति प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।
ललिता सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें।
इस दिन पीले या गुलाबी जैसे शुभ के कपड़े ही पहनें।
इसके बाद पूजा स्थल या मंदिर की सफाई कर लें और हर तरफ गंगाजल छिड़कर शुद्ध कर लें।
अब एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।
इसके बाद चौकी पर राधा-कृष्ण और ललिता देवी का चित्र स्थापित करें।
फिर घी वाला दीप और धूप जलाएं और ललिता देवी समेत राधा-कृष्ण का ध्यान करें।
ललिता देवी और राधा-कृष्ण की प्रतिमा को गंगाजल या पंचामृत से स्नान कराएं।
इसके बाद चंदन, कुमकुम, रोली, और हल्दी से तिलक करें।
राधा रानी और ललिता देवी को लाल चुनरी या वस्त्र अर्पित करें।
फूल, तुलसी पत्र और माखन-मिश्री, खीर और मिठाई का भोग लगाएं।
अंत में भगवान कृष्ण और राधा रानी की आरती उतारें और पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
हिन्दू धर्म में ललिता सप्तमी व्रत का बड़ा महत्व बताया गया हैं। यह व्रत राधा देवी की सखी ललिता को समर्पित है। वह वृंदावन की एक गोपी हैं। इस व्रत को पहली बार श्रीकृष्ण द्वारा बताए जाने पर रखा गया था।
ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से नवविवाहित जोड़ों को स्वस्थ और सुंदर संतान प्राप्ति होती है। साथ ही यह व्रत संतान की अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए भी रखा जाता है।