

बछ बारस 2026 की तारीख अलग-अलग राज्यों में अलग है।
गुजरात और महाराष्ट्र में यह पर्व 5 नवंबर को मनाया जाएगा।
बछ बारस को गोवत्स द्वादशी और वाघ बारस भी कहते हैं।
इस दिन गाय और बछड़े की पूजा की जाती है।
व्रत में साहूकार और पोते की कहानी सुनाई जाती है।
Govatsa Dwadashi 2026: बछ बारस हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माताएं अपनी संतान की खुशहाली और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से यह व्रत रखती हैं।
इस पर्व को गोवत्स द्वादशी, बछ द्वादशी और क्षेत्रीय परंपराओं में वाघ बारस या वसु बारस भी कहा जाता है। साल 2026 में इसकी तारीख को लेकर एक जरूरी बात जानना आवश्यक है, क्योंकि अलग-अलग राज्यों में यह पर्व अलग तिथियों पर मनाया जाता है। आइए जानते हैं बछ बारस की तारीख, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और प्रचलित व्रत कथा।
उत्तर भारत के राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे क्षेत्रों में प्रचलित भाद्रपद कृष्ण द्वादशी वाली बछ बारस 8 सितंबर 2026, मंगलवार को मनाई गई थी। वहीं, गुजरात और महाराष्ट्र में कार्तिक कृष्ण द्वादशी पर मनाई जाने वाली गोवत्स द्वादशी या वाघ बारस 5 नवंबर 2026, गुरुवार को है।
इसलिए पूजा की तारीख तय करते समय अपने क्षेत्र की परंपरा और स्थानीय पंचांग को ध्यान में रखना चाहिए।
तारीख: 5 नवंबर 2026, गुरुवार
द्वादशी तिथि प्रारंभ: सुबह 10:35 बजे
द्वादशी तिथि समाप्त: 6 नवंबर को सुबह 10:30 बजे
प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: शाम 5:33 बजे से रात 8:10 बजे तक।
सूर्योदय: सुबह 6:36 बजे
सूर्यास्त: शाम 5:33 बजे
इस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा की तैयारी करें। गाय और बछड़े को साफ पानी से स्नान कराएं या उनके पैर धोकर रोली और हल्दी से तिलक करें। इसके बाद फूल, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें।
गाय और बछड़े को गुड़, भीगा हुआ चना, मोठ और हरा चारा खिलाएं। पूजा के दौरान संतान की खुशहाली के लिए प्रार्थना करें और बछ बारस की व्रत कथा सुनें। यदि आसपास गाय और बछड़ा उपलब्ध न हों, तो उनकी तस्वीर या मिट्टी की प्रतिमा का पूजन भी किया जा सकता है।
बछ बारस की प्रचलित लोककथा एक साहूकार और उसके परिवार से जुड़ी है। कथा के अनुसार, साहूकार ने गांव में एक बड़ा तालाब बनवाया था, लेकिन उसमें लंबे समय तक पानी नहीं ठहरता था। बाद में पंडितों की सलाह पर परिवार को एक कठिन निर्णय लेना पड़ा और साहूकार के बड़े पोते से जुड़ी दुखद घटना हुई।
कुछ समय बाद बछ बारस के दिन तालाब की पूजा के दौरान एक अनोखी घटना हुई। साहूकार की बड़ी बहू का पोता फिर से जीवित होकर उसके सामने आ गया। इसी बीच दासी की गलतफहमी के कारण गाय के बछड़े से जुड़ी घटना भी हुई।
शाम को गाय के अपने बछड़े को खोजने पर वह भी जीवित मिल गया। इस घटना को परिवार ने बछ बारस माता की कृपा माना। तभी से संतान की खुशहाली के लिए यह कथा सुनने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बछ बारस पर गाय और बछड़े की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। इस दिन कई परिवारों में गाय का दूध, दही और घी खाने से परहेज किया जाता है। साथ ही बाजरा, मोठ और चने जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है। यह पर्व गाय के प्रति सम्मान, मातृत्व और संतान के प्रति प्रेम का संदेश देता है।