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शुक्र प्रदोष व्रत की कथा पढ़ते ही खुल जाते हैं सौभाग्य के द्वार, जानिए व्रत की महिमा

Pradosh Vrat Katha:शुक्र प्रदोष व्रत विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

सीमा कुमारी

Shukra Pradosh Vrat Katha: आज माघ महीने का पहला प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। इस दिन का सनातन धर्म में खास महत्व है। प्रदोष व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। इस बार माघ महीने का प्रदोष व्रत शुक्रवार को पड़ रहा है। ऐसे में आज शुक्र प्रदोष व्रत मनाया जा रहा है।

प्रदोष व्रत बिना पूजा में कथा का पाठ किए या सुने पूरा नहीं माना जाता है, इसलिए प्रदोष व्रत के दिन पूजा के समय कथा का पाठ अवश्य करना या सुनना चाहिए. ऐसे में आइए जान लेते हैं शुक्र प्रदोष व्रत की कथा।

शुक्र प्रदोष व्रत कथा

पुराणों में शुक्र प्रदोष व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। इस व्रत की कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक नगर में तीन घनिष्ठ मित्र रहते थे। इनमें एक ब्राह्मण, दूसरा धनिक और तीसरा राजा का पुत्र था। तीनों का विवाह हो चुका था, लेकिन धनिक मित्र का अभी गौना नहीं हुआ था, इसलिए उसकी पत्नी मायके में ही रहती थी।

एक दिन तीनों मित्र आपस में बातचीत कर रहे थे। तभी ब्राह्मण मित्र ने कहा जिस घर में स्त्री नहीं होती, वहां नकारात्मक शक्तियों का वास हो जाता है। यह बात सुनकर धनिक पुत्र ने तुरंत निश्चय कर लिया कि वह अपनी पत्नी को मायके से वापस ले आएगा।

अगले दिन वह पत्नी को लाने की तैयारी करने लगा। जब उसके माता-पिता को इसका पता चला, तो उन्होंने उसे समझाया कि शुक्र अस्त हैं और शुक्र ग्रह वैवाहिक सुख के कारक माने जाते हैं। ऐसे समय में पत्नी को लाना अशुभ होता है।

लेकिन धनिक पुत्र ने माता-पिता की बात नहीं मानी और ससुराल चला गया। वहां भी सास-ससुर ने उसे वही बात समझाई, पर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। अंततः मजबूर होकर ससुराल वालों ने बेटी को विदा कर दिया।

जब दोनों पति-पत्नी बैलगाड़ी से लौट रहे थे, तभी रास्ते में बैलगाड़ी का पहिया टूट गया और बैल की टांग भी टूट गई। दोनों को गंभीर चोटें आईं। आगे चलकर डाकुओं ने उनका सारा धन लूट लिया। किसी तरह वे घर पहुंचे, लेकिन वहां धनिक पुत्र को सांप ने काट लिया।पिता उसे वैद्य के पास ले गए, जहां वैद्य ने तीन दिन बाद उसकी मृत्यु की आशंका जताई।

यह समाचार जब ब्राह्मण मित्र को मिला, तो वह तुरंत धनिक पुत्र के घर पहुंचा। उसने सलाह दी कि पुत्र और उसकी पत्नी को फिर से ससुराल भेज दिया जाए, क्योंकि वे शुक्र अस्त में लौटे थे। साथ ही उसने कहा कि यदि शुक्र प्रदोष व्रत रखकर विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा की जाए, तो पुत्र के प्राण बच सकते हैं।

धनिक पुत्र के पिता ने ब्राह्मण की बात मान ली। उन्होंने शुक्र प्रदोष व्रत रखा और पूरे श्रद्धा भाव से भगवान शिव की आराधना की। व्रत के प्रभाव से धनिक पुत्र की हालत धीरे-धीरे सुधरने लगी और वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया।

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