

आज है सर्वपितृ अमावस्या की सही तिथि।
अज्ञात तिथि वाले पितरों का तर्पण करना जरुरी।
पंचबलि भोग और दक्षिण मुखी दीपदान की निभाएं रस्म।
पितृ दोष शांति और समृद्धि के करें उपाय।
Significance of Sarva Pitru Amavasya: सनातन धर्म में अमावस्या और पूर्णिमा तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। यूं तो प्रत्येक माह की अमावस्या पर स्नान और दान का पुण्य प्राप्त होता है, लेकिन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या का स्थान सबसे ऊपर है। इसे सर्वपितृ अमावस्या, पितृविसर्जनी अमावस्या, महालय समापन या महालय विसर्जन के नाम से जाना जाता है। यह दिन 15 दिनों से चले आ रहे पितृपक्ष का अंतिम दिन होता है।
इस पावन दिन उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, जिनकी मृत्यु की तिथि परिजनों को याद नहीं होती। जो श्रद्धालु किसी कारणवश पितृपक्ष के 15 दिनों में अपने पूर्वजों का श्राद्ध नहीं कर पाते हैं, वे भी इस अमावस्या को तर्पण करके पूरे पक्ष का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।
शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध और तर्पण का कार्य उदया तिथि में करना अत्यंत श्रेष्ठ और फलदायी माना जाता है। इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या की तिथि उदया तिथि के अनुसार आज मानी जा रही है। इसलिए आज ही मुख्य श्राद्ध किया जाएगा।
अमावस्या तिथि का आरंभ: 09 अक्टूबर 2026, रात 09:35 बजे से
अमावस्या तिथि का समापन: 10 अक्टूबर 2026, रात 09:19 बजे तक
पितरों की विदाई और आशीर्वाद का पावन दिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कृष्ण पक्ष में पितरों का निवास माना गया है। आश्विन मास के इस विशेष काल को 'महालय' कहा जाता है। सर्वपितृ अमावस्या के दिन धरती पर वायु रूप में आए हुए पितर अपने परिजनों से पिंडदान और तर्पण की आशा रखते हैं।
इस दिन विधि-विधान से किया गया श्राद्ध पितरों को तृप्त करता है। तृप्त होकर पूर्वज अपने परिवार को सुख, शांति, वंश वृद्धि और समृद्धि का शुभाशीष देकर पुनः अपने लोक की ओर प्रस्थान करते हैं। यदि कोई परिवार गृह क्लेश, आर्थिक तंगी या पितृ दोष से पीड़ित है, तो इस दिन श्राद्ध करने से दोषों का शमन होता है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवात्मा की गति के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक नियम स्थापित किया है। संपूर्ण ब्रह्मांड बारह राशियों में बंधा हुआ है, जिसमें मेष राशि को ब्रह्मांड का प्रवेश द्वार माना गया है। मीन राशि का द्वार देवलोक अर्थात् सूर्यलोक की ओर खुलता है, जबकि कन्या राशि का द्वार पितृलोक अर्थात् चंद्रलोक की ओर जाता है।
जब सूर्यदेव कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तब पाताल और पितृलोक की सृष्टि जागृत हो जाती है। चंद्रमा की पूर्णिमा से अमावस्या तक की 16 तिथियां वस्तुतः 16 कलाएं हैं। मनुष्य की मृत्यु जिस तिथि को होती है, वही कला उसके लिए खुलती है और जीव को वहां स्थान मिलता है।
भाद्रपद पूर्णिमा से पितृलोक के जागृत होने पर पूर्वज पृथ्वीलोक पर अपने प्रियजनों के घर आते हैं। यदि परिवार उनके निमित्त पूजा, नैवेद्य और दान करता है, तो वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध न होने पर वे व्यथित होकर लौटते हैं, जिससे कुल के आराध्य देवी-देवता भी खिन्न हो जाते हैं।
इस दिन सामूहिक रूप से ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों के लिए तर्पण करने की यह परंपरा है। इसके लिए कुछ खास नियम बताए जाते हैं, जिनको फॉलो करके सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध किया जाता है।
विस्मृत तिथियों की पूर्ति: जिन पूर्वजों की देहावसान तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध इसी दिन संपन्न होता है।
भूल-चूक की भरपाई: पूरे पितृपक्ष में यदि श्राद्ध छूट गया हो, तो केवल आज के दिन तर्पण करने से संपूर्ण पक्ष का फल मिल जाता है।
पितृ दोष से मुक्ति: सही विधि से किया गया श्राद्ध और दान-पुण्य घर में व्याप्त पितृ दोष के प्रभाव को समाप्त करता है।
पंचबलि और जीव सेवा: देव, गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों को अन्न का भाग अथवा पंचबलि देने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।
उपनिषदों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या पर किया गया श्राद्ध पितरों को पूरे एक वर्ष के लिए संतुष्ट कर देता है। इस दिन भोजन में विशेष रूप से दूधपाक (खीर), पूड़ी, कढ़ी और चावल बनाना चाहिए, क्योंकि इसे पितरों का प्रिय भोजन माना गया है।
भोजन तैयार होने के पश्चात सबसे पहले कौवे, गाय और कुत्ते के लिए भोजन का अंश निकालना चाहिए। मान्यता है कि पितृदेव इन जीवों का रूप धारण करके अन्न ग्रहण करने आते हैं और अपने वंशज को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या की शाम को पितरों की सुखद विदाई के लिए दीपदान करने की परंपरा है। शाम के समय घर के मुख्य द्वार या आंगन में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके मिट्टी का चार मुख वाला दीपक जलाएं।
दीपक में काले तिल और तिल का तेल या शुद्ध देशी घी का प्रयोग करना चाहिए। दीपक जलाते समय 'ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः' अथवा 'ॐ यमाय नमः' मंत्र का निरंतर जाप करें। इसके बाद अपने पितरों से परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हुए उन्हें आदरपूर्वक विदा करें।