सफला एकादशी की पौराणिक कथा बिना इसके अधूरा माना जाता है व्रत
Ekadashi vrat: सफला एकादशी पर व्रत के साथ पौराणिक कथा का पाठ अत्यंत आवश्यक माना गया है। यह कथा न केवल पापों से मुक्ति दिलाती है, बल्कि जीवन में सुख-समृद्धि और भगवान विष्णु की कृपा भी प्रदान करती है।
- Written By: सीमा कुमारी
क्यों आवश्यक है पौराणिक कथा का पाठ (सौ.सोशल मीडिया)
Saphala Ekadashi Vrat Katha:आज 15 दिसंबर 2025, सोमवार को सफला एकादशी का व्रत रखा जा रहा है यह व्रत हिन्दू धर्म में जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित हर साल पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन रखा जाता है। इस दिन व्रत करने के साथ-साथ विधि-विधान से जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत और पूजा करने से भगवान विष्णु अति प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
शास्त्रों के अनुसार, सफला एकादशी के दिन पूजा के समय व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। अगर व्रत कथा पढ़ नहीं सकते तो सुनना चाहिए। क्योंकि इस दिन बिना व्रत कथा पढ़े या सुने पूजा और व्रत पूरा नहीं माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत कथा पढ़ने और सुनने से भगवान विष्णु सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
क्यों आवश्यक है पौराणिक कथा का पाठ
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, किसी भी एकादशी व्रत को पूर्ण फलदायी बनाने के लिए उसकी पौराणिक कथा का श्रवण या पाठ अनिवार्य होता है। माना जाता है कि बिना कथा पढ़े या सुने किया गया व्रत अधूरा रहता है और उसका पूरा पुण्य प्राप्त नहीं हो पाता।
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सफला एकादशी पर पढ़ें यह पौराणिक कथा
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। इन्हीं में से एक है पौष मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली सफला एकादशी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने के साथ-साथ इसकी पौराणिक कथा का पाठ या श्रवण करना अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि बिना कथा पढ़े किया गया व्रत अधूरा रहता है और उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में चम्पावती नगरी में महिष्मत नामक एक प्रतापी राजा राज्य करता था। उसका पुत्र लुम्पक अत्यंत दुराचारी और गलत संगति में पड़ चुका था। अपने पुत्र के व्यवहार से दुखी होकर राजा ने उसे राज्य से निकाल दिया। वन में रहते हुए लुम्पक चोरी और बुरे कर्मों में लिप्त हो गया, जिससे उसका जीवन कष्टमय बन गया।
एक दिन पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को वह भूख और थकान से व्याकुल होकर एक पीपल के वृक्ष के नीचे रुक गया। संयोगवश उसी दिन सफला एकादशी थी। मजबूरी में वह न तो भोजन कर सका और न ही किसी प्रकार का सुख भोग पाया। पूरी रात जागकर उसने उसी पीपल वृक्ष के नीचे विश्राम किया। अगले दिन द्वादशी को उसने अनजाने में ही व्रत का पालन कर लिया।
इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उसके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया। भगवान विष्णु की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो गए और उसे पुनः सम्मान, वैभव और सुख की प्राप्ति हुई। बाद में राजा ने भी अपने पुत्र को क्षमा कर उसे राज्य सौंप दिया। इस प्रकार सफला एकादशी ने उसके जीवन को सफल और सार्थक बना दिया, तभी से इस एकादशी का नाम “सफला” पड़ा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सफला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पाप कटते हैं और जीवन में सफलता के मार्ग खुलते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और कथा का पाठ विशेष फलदायी माना गया है। माना जाता है कि यह एकादशी न केवल सांसारिक सुख देती है, बल्कि मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करती है।
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इसी कारण शास्त्रों और पुराणों में कहा गया है कि सफला एकादशी पर व्रत के साथ इसकी पौराणिक कथा अवश्य पढ़नी या सुननी चाहिए, क्योंकि इसके बिना व्रत को पूर्ण नहीं माना जाता।
