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Rani Laxmi Bai: सिर्फ 29 साल की उम्र में इतिहास रच गई थीं रानी लक्ष्मीबाई, जानें उनकी बहादुरी के अनसुने किस्से
- Written By: रीता राय सागर
Rani Laxmi Bai Death Anniversary: झांसी की रानी लक्ष्मी बाई वीरता की ऐसी मिसाल थीं, जिनकी वीरगाथा हर भारतीय महिला के लिए प्रेरणादायी है। उनकी वीरता के मुरीद उनके खिलाफ लड़ने वाले अंग्रेज तक हो गए थे।

रानी लक्ष्मी बाई (फोटो.सोशल मीडिया)
Jhansi Ki Rani Lakshmi Bai Biography: पेशवा शासक बाजीराव द्वितीय के घर एक असामान्य ब्राह्मण परिवार में जन्मी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर, 1835 में काशी में हुआ था और उनकी म्रत्यु 17 जून, 1858 में कोठा-की-सेराई, ग्वालियर के पास हुई थी।
आज हम जिस रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धा पुष्प अर्पित कर रहे हैं, वो उस वीरता शौर्य साहस और पराक्रम का नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में वो मुकाम हासिल किया, जिसकी मिसाल आज भी दुर्लभ है।
अंग्रेजों को युद्ध के लिए ललकारा
25 वर्ष की एक महिला जिसने अपने पति और पुत्र को खोने के बाद भी अंग्रेजों को युद्ध के लिए ललकारने का जज्बा रखती हो वो नि:संदेह हर महिला के लिए प्रेरणा स्रोत रहेगी। वो ऐसा दौर था, जब 1857 की क्रांति से घायल अंग्रेजों ने भारतीयों पर और अधिक अत्याचार करने शुरू कर दिए थे और बड़े से बड़े राजा भी अंग्रेजों के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।
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ऐसे समय में रानी लक्ष्मीबाई की दहाड़ ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई की इस दहाड़ की गूंज झांसी तक सीमित नहीं रही, वो पूरे देश में सुनाई दी और उस आवाज से बच्चे-बच्चे में हिम्मत भर दिया।
जब रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी सौंपने से किया इंकार
पेशवा के दरबार में लड़कों के साथ बढ़ते हुए, उन्होंने मार्शल आर्ट, तलवारबाजी व घुड़सवारी का प्रशिक्षण लिया। 27 फरवरी 1854 को लॉर्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तकपुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी।
22 साल की रानी ने झांसी को अंग्रेजों को सौंपने से मना कर दिया। साल 1857 में विद्रोह की शुरुआत के कुछ समय बाद झांसी में लक्ष्मी बाई के शासन की घोषणा की गई और उन्होंने अपने नाबालिग उत्तराधिकारी की ओर से झांसी पर शासन किया। अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में शामिल होने के बाद, उन्होंने तेजी से अपने सैनिकों को संगठित किया और बुंदेलखंड क्षेत्र में विद्रोहियों का प्रभार संभाला। पड़ोसी क्षेत्रों ने उनका समर्थन किया और उनकी ओर से विद्रोहियों से लड़े।
आत्मसमर्पण से किया इंकार
जनरल ह्यूज रोज (Gen. Hugh Rose) के तहत, ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने जनवरी 1858 तक बुंदेलखंड में अपनी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी थी। महू से आगे बढ़ते हुए, रोज ने फरवरी में सागौर पर कब्जा कर लिया और फिर मार्च में झांसी की ओर बढ़ गए। कंपनी की सेनाओं ने झांसी के किले को घेर लिया और युद्ध छिड़ गया। आक्रमणकारी ताकतों को कड़ा प्रतिरोध देते हुए, लक्ष्मी बाई ने अपने सैनिकों के मरने के बाद भी आत्मसमर्पण नहीं किया। लक्ष्मी बाई महल के रक्षक की मदद से किले से भागने में कामयाब रही और पूर्व की ओर चली गई, जहां अन्य विद्रोहियों को भी अपनी ओर किया।
रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से मिलने वाली प्रेरणा
- हर परिस्थिति में आत्म सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा। जब आपके पास दो विकल्प हो आत्म समर्पण या लड़ाई, तो लड़कर अपने स्वाभिमान को बचाना।
- रानी लक्ष्मी बाई के पास अंग्रेजों के मुकाबले संसाधनों और सैनिकों की कमी थी, लेकिन इससे उनका हौसला डगमगाया नहीं बल्कि और मजबूत कर दिया।
- हर हाल में अपनी झांसी को बचाना ही उनका लक्ष्य था, जिसके लिए वो अपनी जान देकर अमर हो गईं।
- मात्र 25 वर्ष की आयु में अपने राज्य की रक्षा के लिए ब्रिटिश साम्राज्य से विद्रोह हमें सिखाता है कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है। उन्होंने अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर न्याय के लिए लड़कर गीता का ज्ञान चरितार्थ कर दिखाया।
- जो सबसे महत्वपूर्ण और व्यवहारिक शिक्षा रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से हमें मिलती है वो ये कि शस्त्र और शास्त्र विद्या, तार्किक बुद्धि, युद्ध कौशल और ज्ञान किसी औपचारिक शिक्षा की मोहताज नहीं है। उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की थी, लेकिन उनके युद्ध कौशल ने ब्रिटिश साम्राज्य को भी अचंभे में डाल दिया था।
Rani laxmi bai death anniversary inspiration from rani laxmibai life story
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