

Jhansi Ki Rani Lakshmi Bai Biography: पेशवा शासक बाजीराव द्वितीय के घर एक असामान्य ब्राह्मण परिवार में जन्मी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर, 1835 में काशी में हुआ था और उनकी म्रत्यु 17 जून, 1858 में कोठा-की-सेराई, ग्वालियर के पास हुई थी।
आज हम जिस रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धा पुष्प अर्पित कर रहे हैं, वो उस वीरता शौर्य साहस और पराक्रम का नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में वो मुकाम हासिल किया, जिसकी मिसाल आज भी दुर्लभ है।
25 वर्ष की एक महिला जिसने अपने पति और पुत्र को खोने के बाद भी अंग्रेजों को युद्ध के लिए ललकारने का जज्बा रखती हो वो नि:संदेह हर महिला के लिए प्रेरणा स्रोत रहेगी। वो ऐसा दौर था, जब 1857 की क्रांति से घायल अंग्रेजों ने भारतीयों पर और अधिक अत्याचार करने शुरू कर दिए थे और बड़े से बड़े राजा भी अंग्रेजों के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। ऐसे समय में रानी लक्ष्मीबाई की दहाड़ ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई की इस दहाड़ की गूंज झांसी तक सीमित नहीं रही, वो पूरे देश में सुनाई दी और उस आवाज से बच्चे-बच्चे में हिम्मत भर दिया।
पेशवा के दरबार में लड़कों के साथ बढ़ते हुए, उन्होंने मार्शल आर्ट, तलवारबाजी व घुड़सवारी का प्रशिक्षण लिया। 27 फरवरी 1854 को लॉर्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तकपुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। 22 साल की रानी ने झांसी को अंग्रेजों को सौंपने से मना कर दिया। साल 1857 में विद्रोह की शुरुआत के कुछ समय बाद झांसी में लक्ष्मी बाई के शासन की घोषणा की गई और उन्होंने अपने नाबालिग उत्तराधिकारी की ओर से झांसी पर शासन किया। अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में शामिल होने के बाद, उन्होंने तेजी से अपने सैनिकों को संगठित किया और बुंदेलखंड क्षेत्र में विद्रोहियों का प्रभार संभाला। पड़ोसी क्षेत्रों ने उनका समर्थन किया और उनकी ओर से विद्रोहियों से लड़े।
जनरल ह्यूज रोज (Gen. Hugh Rose) के तहत, ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने जनवरी 1858 तक बुंदेलखंड में अपनी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी थी। महू से आगे बढ़ते हुए, रोज ने फरवरी में सागौर पर कब्जा कर लिया और फिर मार्च में झांसी की ओर बढ़ गए। कंपनी की सेनाओं ने झांसी के किले को घेर लिया और युद्ध छिड़ गया। आक्रमणकारी ताकतों को कड़ा प्रतिरोध देते हुए, लक्ष्मी बाई ने अपने सैनिकों के मरने के बाद भी आत्मसमर्पण नहीं किया। लक्ष्मी बाई महल के रक्षक की मदद से किले से भागने में कामयाब रही और पूर्व की ओर चली गई, जहां अन्य विद्रोहियों को भी अपनी ओर किया।