Navratri Special: पहले दिन मां शैलपुत्री, नौवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा क्यों? जानें अर्धनारीश्वर का रहस्य

Maa Siddhidatri Puja Significance: नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा क्यों होती है? जानें दोनों देवियों के नाम का अर्थ और उनकी साधना से जुड़ी खास बातें।
Navratri maa shailputri maa siddhidatri puja importance.
शैलपुत्री और सिद्धिदात्री मांफोटो.सोशल मीडिया
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Maa Shailputri Puja Significance: नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के प्रथम दिन से लेकर नौंवे दिन तक एक अलग देवी को समर्पित होता है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से शुरुआत होती है, जबकि नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना के साथ नवरात्रि का समापन होता है। जानिए नवरात्रि की शुरुआत और आखिरी दिन इन्हीं दोनों देवियों की पूजा क्यों की जाती है?

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा

मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में मां शैलपुत्री को पहला स्थान दिया गया है। 'शैल' का अर्थ पर्वत और 'पुत्री' का अर्थ बेटी होता है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण देवी को शैलपुत्री नाम मिला। मां शैलपुत्री के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल सुशोभित है। उनका वाहन वृषभ यानी बैल है।

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा के साथ साधना की शुरुआत होती है। उन्हें स्थिरता, साहस और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। उनकी आराधना भक्तों को मन में विश्वास बनाए रखने और संकल्प के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है, जो नौ दिनों की पूजा के लिए संकल्प होता है।

मां शैलपुत्री का मूलाधार चक्र से क्या संबंध है?

योग और आध्यात्मिक परंपराओं में मां शैलपुत्री का संबंध मूलाधार चक्र से बताया गया है। इसे शरीर के सात प्रमुख चक्रों में पहला चक्र माना जाता है। आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार, मूलाधार चक्र स्थिरता, सुरक्षा और धरातल से जुड़े रहने का प्रतीक है। इसी वजह से मां शैलपुत्री की पूजा को साधना की मजबूत नींव रखने से जोड़कर देखा जाता है।

नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा

नवरात्रि के नौवें दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। उनके नाम में स्थित 'सिद्धि' का अर्थ विशेष योग्यता या शक्ति और 'दात्री' का अर्थ देने वाली होता है। मां सिद्धिदात्री आठ सिद्धियों की अधिष्ठात्री देवी हैं। इन सिद्धियों के नाम अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व हैं।

मां सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान है। उनके चार हाथों में कमल, शंख, गदा और चक्र होते हैं। नवरात्रि के अंतिम दिन उनकी पूजा को पूर्णता, ज्ञान और सिद्धि के भाव से जोड़ा जाता है। इस दिन भक्त सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देवी की आराधना करते हैं।

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भगवान शिव और मां सिद्धिदात्री का संबंध

भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की आराधना करके सिद्धियां प्राप्त की थीं। यह भी कहा जाता है कि देवी की कृपा से भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप प्रकट हुआ। इस स्वरूप में शिव के आधे भाग में शक्ति विराजमान हैं।

मां शैलपुत्री से मां सिद्धिदात्री तक की पूजा का भाव

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से साधना की शुरुआत होती है, जबकि नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना के साथ इसका समापन होता है। इन दोनों स्वरूपों को शुरुआत और सिद्धि के भाव से कामना की पूर्ति से जोड़कर देखा जाता है। मां शैलपुत्री दृढ़ता और संकल्प की प्रेरणा देती हैं, तो मां सिद्धिदात्री ज्ञान और सिद्धि की प्रतीक मानी जाती हैं।

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