मन भटके नहीं बस ऐसे करें नाम जप, जीवन बदल देगा ये आसान तरीका, प्रेमानंद जी महाराज का उपाय

Peace of Mind: हर कोई तनाव, चिंता और मोह-माया में उलझा हुआ है। ऐसे में आध्यात्मिक मार्ग ही सच्ची शांति का रास्ता दिखाता है। प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, निरंतर नाम जप मन को शांत रख सकता है।
Nama Japa in this specific way to prevent the mind from wandering remedy prescribed by Premanand Ji Maharaj.
Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
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Premanand Ji Maharaj Talks: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मन को शांत रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। हर कोई तनाव, चिंता और मोह-माया में उलझा हुआ है। ऐसे में आध्यात्मिक मार्ग ही सच्ची शांति का रास्ता दिखाता है। प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, निरंतर नाम जप ही वह अचूक उपाय है, जो इंसान को परम आनंद और भगवान की प्राप्ति तक पहुंचा सकता है।

निरंतर नाम जप का आसान तरीका

निरंतर नाम जप करने के लिए प्रेमानंद जी महाराज उपाय बताते हुए कहते है कि अगर आप चाहते हैं कि आपका भजन बिना रुके चलता रहे, तो एक सरल अभ्यास अपनाएं।

  • अपनी जीभ के अग्र भाग को ऊपर के दांतों के पास हल्के से लगाकर होंठ बंद करें और सांस के साथ मन ही मन नाम मंत्र का जाप करें।
  • जब यह अभ्यास गहरा होता है, तो इसे "खेचरी मुद्रा" कहा जाता है। इस अवस्था में मन भीतर की ओर केंद्रित हो जाता है और एक दिव्य शांति का अनुभव होने लगता है।

हृदय में होने वाला बदलाव और जरूरी सावधानी

जब गुरु द्वारा दिया गया मंत्र लगातार चलने लगता है, तो हृदय में एक विशेष द्रवण क्रिया शुरू होती है, यानी मन कोमल और भावुक हो जाता है। इस समय सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी सांसारिक व्यक्ति या वस्तु के प्रति ज्यादा लगाव न बढ़ने दें। अगर इस अवस्था में मोह बढ़ गया, तो वह मन पर गहरी छाप छोड़ सकता है, जिसे हटाने के लिए फिर से अधिक साधना करनी पड़ेगी। इसलिए बाहरी दुनिया से थोड़ा उदासीन रहकर अपने इष्ट में ही मन लगाना चाहिए।

शरणागति का असली अर्थ समझें

एक सच्चा भक्त कभी कल की चिंता नहीं करता। अगर आपको भविष्य की चिंता सताती है, तो इसका मतलब है कि आपकी शरणागति अभी पूर्ण नहीं हुई है। सोचिए, जब आपके पास कुछ भी नहीं था, तब भी ईश्वर ने आपकी हर जरूरत पूरी की। वही प्रभु आज भी आपके जीवन का ध्यान रखेंगे। यह संसार एक स्वप्न की तरह है, जहां "मेरा-तेरा" का मोह इंसान को भटकाता है।

भक्ति में जाति-पाति का कोई महत्व नहीं

आध्यात्मिक मार्ग में जाति, कुल या सामाजिक पहचान का कोई महत्व नहीं होता। हम सभी परमात्मा के अंश हैं और हमारी असली पहचान वही है। जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान की शरण में आ जाता है, उसका कल्याण निश्चित होता है।

तत्-सुख भाव: भक्ति की ऊंची अवस्था

भक्ति का सर्वोच्च स्तर 'तत्-सुख भाव' माना जाता है। इसका मतलब है अपने सुख को छोड़कर केवल भगवान के सुख के बारे में सोचना। जब यह भावना दिल में गहराई से बस जाती है, तब भक्त को दिव्य अनुभव होने लगते हैं और भगवान के प्रति प्रेम और बढ़ जाता है।

कैसे पाए सच्ची शांति?

जीवन में सच्ची खुशी और शांति पाने के लिए जरूरी है कि हम अपनी इंद्रियों को बाहर की दुनिया से हटाकर भीतर की ओर केंद्रित करें। सद्गुरु की सेवा, उनकी आज्ञा का पालन और निरंतर नाम जप ही वह मार्ग है, जो हमें परम आनंद तक पहुंचाता है।

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