

महाअष्टमी पर की जाती है मां महागौरी की आराधना
आज के दिन है कन्या पूजन का खास महत्व
लगता है नारियल, हलवा-पूरी और काले चने का विशेष भोग
काशी, अमरकंटक, कांगड़ा और विजयवाड़ा में हैं मां के ऐतिहासिक मंदिर
Navratri Day 8 Mahagauri Puja: नवरात्रि के आठवें दिन महाअष्टमी सनातन धर्म में सबसे पवित्र और कल्याणकारी तिथियों में से एक मानी जाती है। इस महापर्व के दिन आदिशक्ति के आठवें स्वरूप मां महागौरी की अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। मां महागौरी अमोघ फलदायिनी, परम शांत, और सौम्यता की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इनका संबंध राहु ग्रह से माना जाता है, और इनकी साधना करने से जीवन के सभी संताप, पाप और मानसिक कष्ट सदा के लिए मिट जाते हैं।
नवरात्रि के आंठवे दिन मां महागौरी का स्वरूप अत्यंत उज्ज्वल, कांतिमान और मनोहारी है। इनकी उपमा शंख, मूनफ्लावर (कुंद के फूल) और बर्फ से की जाती है। इनका वर्ण पूरी तरह से गोरा है, और ये श्वेत वस्त्र व श्वेत आभूषण ही धारण करती हैं। इसी कारण इन्हें 'महागौरी' कहा जाता है।
माता की चार भुजाएं हैं। इनका दाहिना ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में है और नीचे वाले हाथ में त्रिशूल है। बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में डमरू है और नीचे वाला हाथ भक्तों को आशीर्वाद देने वाली वरद मुद्रा में रहता है। माता वृषभ पर सवार हैं, जिसके कारण इन्हें 'वृषारूढ़ा' भी कहा जाता है। इनका यह रूप साक्षात गृहस्थ जीवन में सुख और शांति का प्रतीक है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्वजन्म में जब माता ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक बिना अन्न-जल के अत्यंत कठिन तपस्या की थी, तब धूप, धूल, वर्षा और ठंड के कारण उनका पूरा शरीर एकदम काला और क्षीण पड़ गया था। उनकी इस अचल निष्ठा और घोर तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव प्रकट हुए, तो उन्होंने माता पार्वती को स्वीकार किया।
महादेव ने जब गंगा जी के पवित्र जल से देवी के काले शरीर को धोया और स्नान कराया, तब गंगाजल के प्रभाव से माता का पूरा शरीर अत्यधिक कांतिमान और बिजली की चमक की भांति पूरी तरह से गोरा हो गया। उनका रूप देखकर स्वयं महादेव विस्मित रह गए और उन्होंने प्रेम से देवी को 'महागौरी' नाम दिया।
महाअष्टमी के दिन देश भर के घरों और पंडालों में महापूजा, संधि पूजा और कन्या पूजन का विधान है:---
सुबह जल्दी उठकर स्नानादि के बाद पीले, गुलाबी या सफेद रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। माता की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं। उन्हें रोली, कुमकुम, अक्षत और सफेद रंग के फूलों में मोगरा या चमेली जैसे अर्पित करें। महाअष्टमी के दिन माता को संपूर्ण श्रृंगार की सामग्री चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
मां महागौरी को नारियल का भोग अति प्रिय है। अष्टमी के दिन माता को नारियल, नारियल की बर्फी, या हलवा-पूरी और काले चने का नैवेद्य लगाया जाता है।
आज के दिन 2 से 10 वर्ष तक की नौ कुंवारी कन्याओं को साक्षात माता का स्वरूप मानकर घर बुलाया जाता है। उनके चरण धोकर, उन्हें कुमकुम का तिलक लगाया जाता है और आदरपूर्वक हलवा, पूरी व चने का प्रसाद खिलाकर उपहार व दक्षिणा देकर आशीर्वाद लिया जाता है।
पूजा के समय इस पावन मंत्र का जाप करें:--
श्वेतवृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
साथ ही साथ "ॐ देवी महागौर्यै नमः" का जाप भी किया जा सकता है।
भारतवर्ष में मां महागौरी के कुछ बेहद प्राचीन, जागृत और पौराणिक मंदिर स्थापित हैं, जहां महाअष्टमी के दिन दिव्य दर्शन प्राप्त होते हैं:---
देश में मां महागौरी का सबसे प्रमुख और पौराणिक मंदिर मोक्ष नगरी वाराणसी के गोदौलिया-लक्सा रोड क्षेत्र में स्थित है। स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, नवदुर्गा यात्रा के आठवें दिन इस मंदिर के दर्शन का विशेष महात्म्य है। यहाँ माता का विग्रह अत्यंत दिव्य और ममतामयी है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से वैवाहिक जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और अटूट सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
मध्य प्रदेश के अमरकंटक में नर्मदा नदी के उद्गम स्थल के पास 'माई की बगिया' नाम का एक अत्यंत पवित्र स्थान है, जिसे मां महागौरी का तपोस्थल माना जाता है। यह एक प्राकृतिक और सुंदर बगीचा है जहाँ एक छोटा सा मंदिर है। मान्यता है कि शिवपुत्री नर्मदा को प्रकट करने के लिए आदिशक्ति ने इसी स्थान पर महागौरी स्वरूप में तपस्या की थी।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित प्रसिद्ध ज्वाला जी मंदिर एक महाशक्तिपीठ है, जहां माता की कोई मूर्ति नहीं बल्कि नौ प्राकृतिक ज्वालाएं सदियों से बिना किसी ईंधन के निरंतर जल रही हैं। इन नौ लपटों में से एक प्रमुख पवित्र ज्योति को 'मां महागौरी' का स्वरूप माना जाता है।
दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में इंद्रकीलाद्रि पहाड़ी पर स्थित कनक दुर्गा मंदिर में महाअष्टमी के दिन माता को विशेष रूप से 'महागौरी अलंकारम' अर्थात् महागौरी स्वरूप में सजाया जाता है। यहाँ माता का विग्रह विशुद्ध सोने की आभा जैसा चमकता है।