

Jitiya Vrat Puja Samagri List: संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सलामती के लिए माताओं द्वारा जितिया व्रत रखा जाता है। इस व्रत को बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में बड़े ही श्रद्धा और नियमपूर्वक मनाया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन माताएं व्रत रखकर भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती है और संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए प्रार्थना भी करती है। अगर आप पहली बार जितिया रखने जा रही हैं, तो पूजा के समय किसी चीज की कमी न हो, इसके लिए सामग्री पहले से तैयार कर लें।
सबसे पहले पूजा स्थल के लिए चौकी, लाल या पीला कपड़ा, कलश या लोटा, साफ जल, अक्षत, रोली, हल्दी, चंदन, सिंदूर, मौली और कुशा रख लें। पूजा में भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा, तस्वीर या परंपरा के अनुसार कुश से बने प्रतीक का इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ क्षेत्रों में मिट्टी या गोबर से चील और सियारिन के प्रतीक बनाने की परंपरा भी मिलती है।
पूजा की थाली में ताजे फूल, फूलों की माला, दूर्वा, पान के पत्ते, सुपारी और आम के पत्ते रख सकते हैं। दीप-धूप के लिए मिट्टी या धातु का दीपक, रूई की बाती, घी या तेल, धूप, अगरबत्ती और कपूर पहले से रख लें। पूजा के लिए माचिस या लाइटर जैसी छोटी चीजें भी पहले ही अलग कर देने से ऐन समय पर परेशानी नहीं होगी।
भोग के लिए मौसमी फल, केला, नारियल, मिठाई, बताशे और भीगे हुए चने या मटर जैसी सामग्री परंपरा के अनुसार रखी जाती है। कुछ क्षेत्रों में खीरे को भी पूजा में विशेष रूप से शामिल किया जाता है। जितिया की सामग्री हर इलाके में बिल्कुल एक जैसी नहीं होती, इसलिए अपने घर में चली आ रही परंपरा को प्राथमिकता देना उचित रहेगा।
जितिया व्रत में जिउतिया या जितिया धागे का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए लाल-पीले धागे या परिवार में प्रचलित जितिया आभूषण को पहले से तैयार रखें। साथ ही व्रत कथा की पुस्तक या कथा का विश्वसनीय पाठ भी पूजा के समय के लिए रख सकते हैं। पूजा के दौरान जीमूतवाहन से जुड़ी कथा सुनने-पढ़ने की परंपरा कई जगह प्रचलित है।
जितिया व्रत की पूजा और सामग्री में क्षेत्र तथा परिवार के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए किसी एक सूची को अंतिम नियम मानने के बजाय अपने घर की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार सामग्री तय करें।
3 अक्टूबर को मुख्य व्रत रहेगा, जबकि 4 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद पारण किया जाएगा। पंचांग के अनुसार समय शहर के हिसाब से बदल सकता है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग से पारण का समय जरूर जांच लें।