इस दिन मनाया जाएगा प्रकृति को समर्पित यह त्योहार, जानें सही डेट और महत्व
हरेला पर्व प्रकृति से जुड़ा हुआ है। उत्तराखंड में हरेला पर्व से सावन मास की शुरुआत मानी जाती है। सावन मास के हरेला पर्व का विशेष महत्व है सावन भगवान शिव का प्रिय मास है और उत्तराखंड को शिव भूमि भी कहा जाता है।
- Written By: दीपिका पाल
हरेला त्योहार (सौ.सोशल मीडिया)
प्रकृति को समर्पित लोकपर्व ‘हरेला’ (Harela) उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में विशेष रूप से मनाया जाने वाला मुख्य त्योहार है। इस वर्ष ‘हरेला’ का पावन पर्व 16 जुलाई 2024 को मनाया जाएगा। ये पर्व श्रावण मास शुरू होने से कुछ दिन पहले मनाया जाता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस दिन विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन के साथ पौधारोपण भी किया जाता है। हरेला पर्व से नौ दिन पहले ही घर में मिट्टी या फिर बांस की टोकरी में हरेला बोया जाता है।
फिर नौ दिनों तक इस पात्र को सींचा जाता है। दसवें दिन इस पात्रा में उगे पौधों को काट दिया जाता है। फिर घर के सदस्य कटे हुए हरेला को अपने शीश पर रखते हैं। मान्यता है ये रस्म निभाने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। हरेला पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है। पहला – चैत्र मास, दूसरा – सावन मास और तीसरा – आश्विन (क्वार) मास में।
जानिए इस त्यौहार से जुड़ी खास बातें
ऐसे में आइए जानते हैं इस त्योहार अहमियत और किस तरह मनाते हैं यह त्योहार
सम्बंधित ख़बरें
उत्तराखंड की ये 10 जगहें बना देंगी आपकी ट्रिप यादगार, देखें पूरी लिस्ट
‘अगर भगवान के दरबार में चोरी, तो फिर सुरक्षित क्या’, राम मंदिर चोरी मामले पर चंद्रशेखर आजाद का तंज
आतंकियों के निशाने पर दिल्ली और उत्तराखंड! धमकी भरा ईमेल मिलने से मचा हड़कंप, हाई अलर्ट पर सुरक्षा एजेंसियां
तलवार, पत्थरबाजी और बंधक! Nagarasu Gurudwara की छत पर क्यों डटे हैं निहंग?, VIDEO
तिथि
हरेला पर्व 16 जुलाई 2024 को मनाया जाएगा। ये पर्व श्रावण मास शुरू होने से कुछ दिन पहले मनाया जाता है।
सावन महीने में पड़ने वाली ‘हरेला’ का महत्व
हरेला पर्व प्रकृति से जुड़ा हुआ है। उत्तराखंड में हरेला पर्व से सावन मास की शुरुआत मानी जाती है। सावन मास के हरेला पर्व का विशेष महत्व है सावन भगवान शिव का प्रिय मास है और उत्तराखंड को शिव भूमि भी कहा जाता है। हरेल पर्व के समय शिव परिवार की पूजा अर्चना की जाती है और धन्यवाद किया जाता है। इस पर्व को शिव पार्वती के विवाह के रूप में भी मनाया जाता है। मान्यता है कि हरेला जितना बड़ा होगा, कृषि में उतना ही फायदा देखने को मिलेगा। वैसे तो हरेला को हर घर में बोया जाता है लेकिन कुछ गांव में सामूहिक रूप से स्थानीय ग्राम देवता के मंदिर में भी हरेला बोई जाती है।
- जानकारों के अनुसार, हरेला बोने के लिए हरेला त्योहार से 12 से 15 दिन पहले से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घर के पास साफ जगह से मिट्टी निकाल कर सुखाई जाती है और उसे छानकर रख लिया जाता है।
- हरेला में 7 या 5 किस्म के अनाज का मिलाकर बोया जाता है। इसमें धान, मक्की, उड़द, गहत, तिल और भट्ट शामिल होते हैं। इसे मंदिर के कोने में रखा जाता है। इसे बोने से लेकर देखभाल तक घर की महिलाएं करती हैं। इस दिन पकवान बनाए जाते हैं।
- बता दें घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में ही हर साल हरेला बोया व काटा जाता है। ऐसी मान्यता है कि हरेला जितना अच्छा होगा उतनी ही फसल भी बढ़िया होगी।
