रावण की लंका में मां बनी एक राक्षसी, त्रिजटा को सीता ने क्यों कहा था मां?
Ramayan Trijata Story: रामायण में कई ऐसे पात्र हैं, जिनकी भूमिका छोटी दिखती है लेकिन असर बेहद बड़ा होता है। ऐसी ही एक अनसुनी लेकिन प्रभावशाली कथा है त्रिजटा की एक राक्षसी की।
- Written By: सिमरन सिंह
Trijata and Mata Sita (Source. Gemini)
Who Was Trijata: रामायण में कई ऐसे पात्र हैं, जिनकी भूमिका छोटी दिखती है लेकिन असर बेहद बड़ा होता है। ऐसी ही एक अनसुनी लेकिन प्रभावशाली कथा है त्रिजटा की एक राक्षसी, जिसे माता सीता ने मां कहकर पुकारा।
कौन थीं त्रिजटा और क्यों मिली मां की उपाधि?
त्रिजटा लंका की एक राक्षसी थीं, जो रावण की सेविका होने के बावजूद अन्य राक्षसों से अलग सोच रखती थीं। सीता ने उन्हें अपने दुख-दर्द बताए, यहां तक कि चिता जलाने में मदद भी मांगी। उस समय त्रिजटा ने एक सच्ची मां की तरह समझाया, रोका और संभाला। यही कारण है कि सीता ने उन्हें मां का दर्जा दिया जो किसी और को नहीं मिला।
राक्षसी होकर भी अलग क्यों थीं त्रिजटा?
त्रिजटा के पूर्वज लंका के सेवक थे और उन्होंने भी परंपरा के अनुसार रावण की सेवा की। वृद्धावस्था में उन्हें अशोक वाटिका की प्रमुख बना दिया गया। उनमें तीन खास गुण थे ईश्वर में विश्वास, कर्तव्यनिष्ठा और सही-गलत की समझ। यही वजह थी कि वे राक्षसों की भीड़ में अलग नजर आती थीं और लोग उन्हें व्यंग्य में त्रिजटा कहने लगे।
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सीता की रक्षा में निभाई सबसे बड़ी भूमिका
जब रावण ने सीता का हरण कर उन्हें अशोक वाटिका में रखा, तब त्रिजटा ही उनकी सबसे बड़ी सहारा बनीं।
- उन्होंने सीता को बताया कि श्राप के कारण रावण बिना अनुमति उन्हें छू नहीं सकता
- अन्य राक्षसियों को सीता को परेशान करने से रोका
- विभीषण और अन्य लोगों तक खबर पहुंचाई
उन्होंने हर स्तर पर सीता की रक्षा की और उनका मनोबल बनाए रखा।
सपने वानर लंका जारी त्रिजटा का भविष्यवाणी वाला सपना
रामचरितमानस में त्रिजटा का एक प्रसिद्ध सपना वर्णित है, “सपने वानर लंका जारी, जातुधान सेना सब मारी” इसका अर्थ है कि वानरों ने लंका में आग लगा दी और राक्षस सेना का नाश कर दिया। यह सपना सिर्फ कल्पना नहीं था, बल्कि रावण के पतन का संकेत था, जिसने आगे चलकर सच का रूप लिया।
रावण की चाल भी की नाकाम
युद्ध के दौरान रावण ने एक नकली सिर बनवाकर सीता को दिखाया, ताकि वे निराश होकर प्राण त्याग दें। लेकिन त्रिजटा ने इस छल को पहचान लिया और सीता को सच्चाई बताकर उनकी रक्षा की।
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राक्षसी से साध्वी बनने तक का सफर
रामायण की कथा के अंत में त्रिजटा का ज्यादा जिक्र नहीं मिलता, लेकिन कथाओं के अनुसार उन्होंने अपना जीवन धर्म और भक्ति में समर्पित कर दिया। कहा जाता है कि काशी में आज भी उनका मंदिर मौजूद है, जहां महिलाएं अपने सुहाग की रक्षा के लिए पूजा करती हैं।
क्यों याद रखी जाती हैं त्रिजटा?
त्रिजटा की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चाई और धर्म का साथ देने वाला व्यक्ति, चाहे किसी भी परिस्थिति में हो, अंत में सम्मान जरूर पाता है। उन्होंने न सिर्फ सीता की रक्षा की, बल्कि राम की विजय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
