बिपत्तारिणी पूजा 2026: क्यों की जाती है मां बिपत्तारिणी की आराधना? जानिए तिथि, पूजा-विधि और इसका महत्व
Bipattarini Puja Date 2026: बिपत्तारिणी पूजा 2026 की तिथि, पूजा-विधि, शुभ समय और धार्मिक महत्व जानें। साथ ही जानिए मां बिपत्तारिणी की आराधना क्यों की जाती है, इस व्रत का क्या महत्व है।
- Written By: सीमा कुमारी
मां बिपत्तारिणी (सौ.AI)
Why Is Bipattarini Puja Celebrated : मां दुर्गा के उग्र और रक्षक स्वरूप मां बिपत्तारिणी की पूजा हर वर्ष आषाढ़ मास में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा और पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में इस पर्व का विशेष महत्व माना जाता है।
मान्यता है कि मां बिपत्तारिणी अपने भक्तों को हर प्रकार की विपत्ति, संकट और अनिष्ट से बचाती हैं। यही कारण है कि इस पूजा का मां काली और मां दुर्गा की शक्ति स्वरूप परंपरा से गहरा संबंध माना जाता है।
बिपत्तारिणी पूजा 2026 कब है?
वैदिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में बिपत्तारिणी पूजा 18 जुलाई, शनिवार और 21 जुलाई, मंगलवार को मनाई जाएगी।
18 जुलाई 2026 को वरीयान योग, रवि योग तथा पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का संयोग रहेगा, जिसे पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
21 जुलाई 2026 को सिद्ध योग और चित्रा नक्षत्र में भी भक्त मां बिपत्तारिणी की विशेष आराधना करेंगे।
स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में इन दोनों तिथियों में से किसी एक दिन व्रत और पूजा की जाती है।
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मां बिपत्तारिणी की पूजा कैसे करें?
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद स्नान कर स्वच्छ अथवा लाल रंग के वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करके चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं।
- चौकी पर मां बिपत्तारिणी, मां दुर्गा या मां काली का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित करें।
- माता को लाल पुष्प, सिंदूर, अक्षत, चुनरी, धूप, दीप, नारियल और मौसमी फल अर्पित करें।
- कई स्थानों पर परंपरा के अनुसार 13 प्रकार के फल, 13 प्रकार के फूल तथा 13 गांठ वाला लाल धागा भी अर्पित किया जाता है। हालांकि यह
- स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार बदल सकता है।
- इसके बाद मां दुर्गा के मंत्रों का जप करें तथा बिपत्तारिणी व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण या पाठ करें।
- अंत में माता की आरती कर प्रसाद सभी में वितरित करें।
- विवाहित महिलाएं सौभाग्य और परिवार की रक्षा की कामना से लाल धागा अपनी कलाई में बांधती हैं।
- पूजा संपन्न होने के बाद विधि-विधान के अनुसार व्रत का पारण करें।
क्यों की जाती है बिपत्तारिणी पूजा?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां बिपत्तारिणी अपने भक्तों को जीवन में आने वाले बड़े से बड़े संकट से बचाने वाली देवी मानी जाती हैं। कहा जाता है कि उनकी कृपा से दुर्घटनाओं, गंभीर बीमारियों, आर्थिक परेशानियों, पारिवारिक कलह और अन्य विपत्तियों से रक्षा होती है।
यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की सुरक्षा और अखंड सौभाग्य की कामना से रखती हैं। ऐसी भी मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा से मां की पूजा करने पर नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम होता है और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि का आगमन होता है।
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मां काली और मां बिपत्तारिणी का क्या है संबंध?
शाक्त परंपरा में मां बिपत्तारिणी को मां दुर्गा और मां काली का ही एक दिव्य एवं उग्र स्वरूप माना जाता है। जिस प्रकार मां काली दुष्ट शक्तियों का संहार कर अपने भक्तों की रक्षा करती हैं, उसी प्रकार मां बिपत्तारिणी भी अपने उपासकों को हर प्रकार के संकट, भय और अनिष्ट से बचाने वाली देवी मानी जाती हैं। इसी कारण इस पूजा में शक्ति स्वरूप मां काली और मां दुर्गा दोनों की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है।
बिपत्तारिणी व्रत का धार्मिक महत्व
मान्यता है कि इस दिन पूरे विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, परिवार पर देवी की कृपा बनी रहती है और हर प्रकार की विपत्ति टलती है।
श्रद्धालु विश्वास करते हैं कि मां बिपत्तारिणी की कृपा से घर में सुख-शांति, वैवाहिक जीवन में मधुरता, आर्थिक उन्नति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसलिए यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि देवी शक्ति पर अटूट विश्वास और परिवार की मंगलकामना का प्रतीक भी माना जाता है।
