
Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Mistakes in Bhajans: भक्ति का मार्ग दिल से शुरू होकर आत्मा तक जाता है, लेकिन Shri Premanand Ji Maharaj के अनुसार अधिकतर साधक अनजाने में ऐसी गलतियाँ कर बैठते हैं, जो उनकी पूरी साधना की कमाई को नष्ट कर देती हैं। प्रभु के भक्तों के प्रति किए गए छह बड़े अपराध भजन के फल को लूट लेते हैं, चाहे व्यक्ति कितनी ही पूजा-पाठ क्यों न करता हो। अक्सर हम किसी महात्मा को उसके वस्त्र, रहन-सहन या आश्रम देखकर आंकने लगते हैं, जबकि भीतर से वह पूर्ण रूप से ब्रह्म में स्थित हो सकता है। Maharaj बताते हैं कि सच्चा वैराग्य बाहरी त्याग नहीं, बल्कि मेरा भाव छोड़ने का नाम है।
Shri Premanand Ji Maharaj कहते हैं कि मैंने ऐसे साधक देखे हैं जो केवल लंगोटी पहनकर अपने त्याग का अहंकार पाल लेते हैं, जबकि कोई सच्चा संत वैभव में रहकर भी पूर्ण रूप से आसक्ति से मुक्त हो सकता है। भक्ति में असली परीक्षा भीतर की स्थिति की होती है, बाहर की नहीं।
भक्ति की रक्षा के लिए इन छह बातों से बचना बेहद जरूरी है:
यदि आप चाहते हैं कि भगवान स्वयं प्रकट हों, तो महाराज दस गुणों पर विशेष जोर देते हैं। स्वयं को सबसे दीन मानना, सदा सत्य बोलना, हर व्यक्ति में ईश्वर का दर्शन करना और तन-मन-धन गुरु व प्रभु को समर्पित करना अनिवार्य है। गुरु की अधीनता स्वीकार नहीं की, तो व्यक्ति माया का दास बन जाता है।
ये भी पढ़े: महाभारत का सबसे बड़ा खलनायक, फिर भी यहां होती है पूजा! दुर्योधन का रहस्यमयी मंदिर जानकर चौंक जाएंगे
Shri Premanand Ji Maharaj साफ कहते हैं, “मैं कोई जादूगर या चमत्कारी नहीं हूं”। यदि किसी की सांसारिक मनोकामना पूरी होती है, तो वह उसके अपने पुण्य का फल है। इस संसार को वह “मृत्यु लोक” बताते हैं, जहां हर सांस मृत्यु की ओर ले जाती है। इसलिए समय को व्यर्थ प्रपंच और तर्क-वितर्क में न गंवाएं।
जीवन की वास्तविक सफलता प्रभु से स्थायी संबंध बनाने में है। स्वयं को सेवक, सखा या सखी मानकर हर क्षण उसी भाव में जीना ही साधना है। “राधा राधा” नाम में डूबकर हृदय की अशुद्धियों को जलाइए। इन सिद्धांतों को अपनाकर मनुष्य इसी जन्म में जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख Shri Premanand Ji Maharaj के प्रवचनों और आध्यात्मिक मान्यताओं पर आधारित है।






