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ये 10 बातें ज़िंदगी को पलट देंगी, भक्ति ऐसी जागेगी कि भगवान भी होगे वश में, श्री प्रेमानंद जी महाराज

Shri Premanand Ji Maharaj: अगर कोई साधक जीवन में भक्ति के वास्तविक भाव को जगाना चाहता है, तो उसे कुछ मूल बातों को सिर्फ जानना नहीं, बल्कि जीना होता है। श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं।

  • By सिमरन सिंह
Updated On: Jan 16, 2026 | 02:58 PM

Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)

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How To Do True Devotion: अगर कोई साधक जीवन में भक्ति के वास्तविक भाव को जगाना चाहता है, तो उसे कुछ मूल बातों को सिर्फ जानना नहीं, बल्कि जीना होता है। श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि अगर साधक इन दस सिद्धांतों को ध्यानपूर्वक अपने आचरण में उतार ले, तो हृदय में ऐसी भक्ति जागती है कि स्वयं परमात्मा भी उस प्रेम के अधीन हो जाते हैं। ये नियम नहीं, बल्कि चेतना को बदलने का मार्ग हैं।

1. सम्मान और बहुमान का भाव

भक्ति का पहला चरण है सम्मान। गुरु या भगवान के विग्रह के सामने से गुजरते समय केवल निकल जाना नहीं, बल्कि हाथ जोड़ना, सिर झुकाना जरूरी है। यह बाहरी क्रिया भीतर विनम्रता पैदा करती है। इसके बाद आता है बहुमान। गुरु द्वारा दिया गया नाम अपनाना, भक्तों का सम्मान करना और प्रसाद को ईश्वर की कृपा मानकर आदर से ग्रहण करना ये सब बहुमान के रूप हैं।

2. मंत्र के प्रति गहरा प्रेम

गुरु द्वारा दिए गए नाम या मंत्र के प्रति प्रीति होना अनिवार्य है। जप कठिन लगता है क्योंकि मन भटकता है, लेकिन यही साधना की कसौटी है। वर्षों तक श्रद्धा और धैर्य से जप करने पर विश्वास अडिग बनता है। जल्दी फल के प्रलोभन में मार्ग नहीं बदलना चाहिए।

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3. विरह और अडिग एकाग्रता

विरह यानी बिछोह का भाव, वास्तव में निरंतर जुड़ाव की अवस्था है। पास होकर भी मिलने की तड़प बनी रहती है, जिससे मन कभी गुरु और भगवान से हटता नहीं। साथ ही इट-विचिकित्सा यानी गुरु और ईश्वर के अलावा किसी से प्रभावित न होना। जैसे उपमन्यु ने इंद्र के वरदान ठुकरा दिए, वैसे ही साधक को सांसारिक आकर्षणों से ऊपर उठना चाहिए।

4. वाणी और जीवन का पूर्ण समर्पण

वाणी का उपयोग केवल महिमा-ख्याति, यानी गुरु और भगवान की प्रशंसा में हो। इसके आगे है तदर्थ-प्राण-धारण जीवन को ईश्वर को समर्पित कर देना। जब जीवन उनका हो जाता है, तब मृत्यु और कष्ट का भय समाप्त हो जाता है। यही अवस्था तदीयता कहलाती है, जहाँ गुरु और भगवान ही माता-पिता, मित्र और धन बन जाते हैं।

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5. सर्वत्र ईश्वर भाव और अप्रतिकूलता

अंतिम अवस्था है सर्वत्र तद्भाव हर जगह गुरु और ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव। साथ ही अप्रतिकूलता, यानी गुरु या भगवान की इच्छा के विरुद्ध न जाना। जो भी स्थिति मिले, उसे उनकी कृपा मानकर स्वीकार करना ही सच्ची भक्ति है।

इन दस बातों सम्मान, बहुमान, प्रेम, विरह, अडिग निष्ठा, महिमा-गान, जीवन-समर्पण, अपनापन, सर्वत्र ईश्वर भाव और अप्रतिकूलता को अपनाकर साधक उस परम भाव को प्राप्त कर सकता है, जो ईश्वर को भी प्रेम के बंधन में बाँध देता है।

10 things will transform your life such devotion will awaken that even god will be under your control says shri premanand ji maharaj

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Published On: Jan 16, 2026 | 02:58 PM

Topics:  

  • Premanand Maharaj
  • Religion
  • Sanatan Hindu religion
  • Spiritual

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