सरकारी अस्पताल में मृत मरीजों की अवहेलना; शवागार का गेट बंद, दो लोगों के शव पडे रहे बाहर

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  • जिला प्रशासन तो दूर स्वास्थ्य विभाग भी नहीं दे रही ध्यान 
  • अनगिनत समस्याओं के मकडजाल में घिरा है सरकारी अस्पताल

यवतमाल. शहर के सरकारी अस्पताल बीते कई दिनों से समस्याओं के मकडजाल में घिरा हुआ है. अस्पताल की समस्याओं का निराकरण करने के लिए जिला प्रशासन तो दूर स्वास्थ्य विभाग भी ध्यान देने को तैयार नहीं है. जिसके चलते आम मरीजों के लिए यह सरकारी अस्पताल सिरदर्द बनते जा रहा है.

यहां पर उपचार लेने के लिए आनेवाले आम मरीजों के साथ ही मृत मरीजों की भी अवहेलनाएं हो रही है. इस बात का ताजा उदाहरण रविवार को देखने को मिला. अस्पताल के शवागार के गेट को लगे ताले की चाबी गुम जाने से पोस्टमार्टम के लिए लाए गए दो लोगों के शव गेट के बाहर लावारिस स्ट्रेचर पर पडे रहे. वहीं अस्पताल के कर्मचारी गेट के ताले की चाबी तलाशते रहे.

मिली जानकारी के अनुसार रालेगांव तहसील के धानोरा गांव में रहनेवाले 65 वर्षीय श्रीराम गोविंद गोडे ने रविवार की सुबह अपने ही घर में फांसी लगा ली. जिसके बाद परिजनों ने श्रीराम गोडे को सरकारी अस्पताल में लाया गया. जहां पर डॉक्टर ने श्रीराम गोविंद गोडे को मृत घोषित कर दिया. इसके बाद मृत श्रीराम गोडे के शव को पोस्टमार्टम के लिए शवागार लाया गया. लेकिन शवागार के गेट को ताला लगा नजर आया.

इतना ही नहीं तो शवागार के पास कोई कर्मचारी भी मौजूद नहीं था. अस्पताल प्रबंधन के कर्मचारियों से इस बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि शवागार के गेट को लगे ताले की चाबी नहीं दिखाई दे रही है और कर्मचारी ताले की चाबी ढूंढने में लग गए. वहीं धूप में श्रीराम गोडे का शव लावारिस शवागार के गेट के बाहर स्ट्रेचर पर पडा रहा.

इसी समय एक अन्य दूसरे व्यक्ति का शव भी शवागार में पोस्टमार्टम के लिए लाया गया. लेकिन वह शव भी शवागार के बाहर लावारिस पडा रहा. दोनों शव शवागार के बाहर पडे रहने के बावजूद भी किसी को इस बात की जरा सी भी फिक्र नजर नहीं आयी. यहां के सरकार अस्पताल की लचर कार्यप्रणाली के चलते ही अधिकांश लोग यहां पर उपचार कराने आने के बजाए निजी अस्पतालों में जाकर इलाज करना पसंद कर रहे है. 

छह महीनों से एम्बुलेंस पडी है बंद

यहां के सरकारी अस्पताल में अनेकों समस्याएं बनी हुई है. बीते छह महीनों से एम्बुलेंस डीजल के अभाव में बंद अवस्था में पडी हुई है. इतना ही नहीं तो अस्पताल में मरीजों को दोपहर के बाद दवाईयों का वितरण बंद कर दिया जाता है. ओपीडी में भर्ती होनेवाले मरीजों को भारी असुविधाओं का सामना करना पड रहा है.

ओपीडी मार्ग पर रहनेवाला गेट बंद कर दिए जाने से अधिष्ठाता के केबिन मार्ग से तीसरी मंजिल पर जाना पड रहा है. जिससे मरीजों के साथ ही रिश्तेदारों को बेवजह परेशान होना पड रहा है. इसके अलावा सरकारी अस्पताल की लिफ्ट बंद रहने से स्ट्रेचर अथवा विलचेयर का सहारा लेकर मरीजों को दूसरी और तीसरी मंजिल तक जाना आना करना पड रहा है. मरीजों को वहां तक लेकर जाने के लिए सहायक कर्मचारी भी मौजूद नहीं रहता है.

तीसरी मंजिल पहुंचने पर भी मरीजों और उनके रिश्तेदारों की परेशानियां कम नहीं होती है. तीसरी मंजिल पर पीने के पानी का कोई प्रबंध नहीं है. इससे पहले यहां पर वॉटर फिल्टर का प्रबंध किया गया था. लेकिन कुछ दिनों बाद वॉटर फिल्टर भी बंद पड गया. सरकारी अस्पताल बीते कई दिनों से समस्याओं के मकडजाल में घिरा हुआ है. लेकिन इन समस्याओं का निराकरण करने की सुध अस्पताल प्रबंधन की ओर से नहीं ली जा रही है.

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