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वर्धा जिले की सात तहसीलों के किसानों को राहत देने संबंधी प्रस्ताव शासन तक पहुंचने की जानकारी है, लेकिन कारंजा-घाडगे को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
किसानों के बीच कारंजा को ट्रिगर-1 में शामिल किए जाने की चर्चा थी, जबकि तहसील कार्यालय से ट्रिगर-2 में शामिल होने की जानकारी मिली।
बारिश की कमी के कारण उत्पादन घटने से किसानों की आर्थिक परेशानियां बढ़ गई हैं।
Drought Affected Farmers Wardha: वर्धा जिले में कम बारिशऔर फसलों के नुकसान से जूझ रहे किसानों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। जिले की सात तहसीलों के किसानों को मुआवजा देने संबंधी प्रस्ताव शासन के पास पहुंचने की जानकारी सामने आई है, लेकिन कारंजा-घाडगे तहसील का नाम इस प्रक्रिया में शामिल नहीं होने से किसानों में असंतोष और चिंता का माहौल है।
सुखाग्रस्त तहसीलों की सूची घोषित होने के बाद कारंजा का समावेश ट्रिगर-1 में होने की चर्चा थी, लेकिन तहसील कार्यालय से जानकारी लेने पर कारंजा को ट्रिगर-2 में शामिल होने की बात सामने आई है। इससे किसानों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।
कारंजा के पात्र किसानों को मुआवजे से वंचित न रहना पड़े, इसके लिए जिला प्रशासन से स्थिति स्पष्ट करने की मांग हो रही है। किसानों का सवाल है कि सात तहसीलों का प्रस्ताव शासन के पास भेजे जाने के दौरान कारंजा की जानकारी क्यों शामिल नहीं हुई? क्या तहसील के लिए अलग से प्रस्ताव भेजा जाएगा और पात्र किसानों को राहत कब मिलेगी ? सुखाग्रस्त सूची में शामिल होने के बावजूद मुआवजे की प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता बनी रहने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। अब जिला प्रशासन इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देता है और कारंजा के किसानों को राहत कब मिलती है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।
मिली जानकारी के अनुसार, सात तहसीलों के किसानों को नुकसान भरपाई देने से संबंधित - जानकारी शासन तक पहुंच चुकी है। मुआवजे की राशि निर्धारित करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी है। हालांकि, कारंजा तहसील को ट्रिगर-1 से बाहर रखे जाने के कारण यहां के किसानों के मुआवजे का मामला फिलहाल स्पष्ट नहीं है। तहसीलदार से पूछने पर कारंजा तहसील के ट्रिगर-2 में शामिल होने की जानकारी दी गई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सुखाग्रस्त सूची में शामिल होने के बावजूद कारंजा के किसानों के मुआवजे की प्रक्रिया कब और कैसे पूरी होगी।
कम बारिश के कारण कारंजा तहसील में खेती प्रभावित हुई है। फसलों पर खर्च करने के बावजूद उत्पादन घटने से किसानों का आर्थिक गणित बिगड़ गया है। परिवार का खर्च चलाने, अगली फसल की तैयारी करने और कृषि ऋण चुकाने की चिता किसानों को सता रही है। दूसरी ओर, पशुओं के लिए चारा और पानी जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा है। खेती से पर्याप्त आमदनी नहीं होने के बावजूद पशुधन के पालन पर अतिरिक्त खर्च उठाना किसानों के लिए चुनौती बन गया है।