

Wardha Datta Meghe Institute: कुछ नाम केवल नाम नहीं होते। उनसे भावनाएं जुड़ी होती हैं। यादें जुड़ी होती हैं और एक पूरा इतिहास जुड़ा होता है। इसलिए दत्ता मेघे परिवार के नाम से वर्षों से पहचानी जाने वाली संस्था का नाम बदलकर अदाणी इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एज्युकेशन एंड रिसर्च किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर उठ रही भावनाएं और कुछ लोगों की नाराजी स्वाभाविक मानी जा सकती है।
आखिर इस संस्थान की नींव रखने वाले दत्ता मेघे का योगदान केवल एक शैक्षणिक संस्था खड़ी करने तक सीमित नहीं रहा। बल्कि उन्होंने विदर्भमें चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक बड़ी सामाजिक पहल को आकार दिया।
हजारों मरीजों के उपचार की व्यवस्था जारी है। चिकित्सा शिक्षा की प्रक्रिया शुरू है और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हो रहा है। व्यवस्थापन में बदलाव के साथ सुविधाओं में सुधार और आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद भी दिखाई दे रही है।
दत्ता मेघे ने जिस सोच के साथ मेडिकल कॉलेज और चिकित्सा संस्थानों की नींव रखी, वह सोच समाजसेवा से जुड़ी थी। सीमित संसाधनों के दौर में एक बड़ा सपना देखना और उसे जमीन पर उतारना आसान नहीं था। उस सपने का परिणाम आज एक विशाल स्वास्थ्य एवं शिक्षा व्यवस्था के रूप में सामने है।
अब इस विरासत के साथ अदाणी समूह की ताकत जुड़ रही है। अदाणी समूह देश के बड़े कारोबारी समूहों में शामिल है। बड़े प्रकल्पों को आकार देने, आधुनिक तकनीक, प्रबंधन क्षमता और बड़े स्तर पर निवेश करने की उसकी क्षमता से स्वास्थ्य क्षेत्र को भी नई दिशा मिलने की संभावना है। ऐसे में इस बदलाव को केवल 'नाम बदलने' के नजरिए से देखना शायद इस पूरे परिवर्तन की तस्वीर को अधूरा कर देगा।
मेघे परिवार से भावनात्मक रूप से जुड़े लोगों के लिए नाम का बदलना निश्चित रूप से आसान विषय नहीं है। वर्षों तक जिस नाम को लोगों ने अपनी आंखों के सामने बढ़ते देखा, जिस नाम के साथ हजारों विद्यार्थियों और मरीजों की यादें जुड़ी हैं। उस नाम का हटना भावनाओं को जन्म देगा ही। लेकिन दत्ता मेघे द्वारा रखी गई नींव को कोई नाम मिटा नहीं सकता यह भी सचाई है।
मेधे परिवार ने जो बीज बोया, उसे नकारा नहीं जा सकता और अदाणी समूह के पास उस पौधे को और बड़ा बनाने की क्षमता है। इसलिए आज इसे केवल किसी एक नाम के खत्म होने और दूसरे नाम के आने की कहानी मानने के बजाय, इसे एक विरासत से दूसरे विस्तार की ओर बढ़ते अध्याय के रूप में भी देखा जा सकता है।
आखिरकार किसी अस्पताल की सबसे बड़ी पहचान उसके बोर्ड पर लिखे नाम से नहीं, बल्कि उस दरवाजे से निकलने वाले उस मरीज की मुस्कान से होती है। जिसे समय पर उपचार मिला और जीवन की नई उम्मीद मिली। मेघे की संवेदना और अदाणी की क्षमता यदि दोनों का उद्देश्य समाजसेवा रहा, तो यह बदलाव केवल नाम का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवा के नए युग की शुरुआत बन सकता है।